कमलेश यादव, रायपुर : गाँव से आए एक अभ्यर्थी के किराये के छोटे कमरे में अब भी लाइट जल रही है। मेज़ पर नोट्स का ढेर है और दीवार पर टाइम-टेबल चिपका है। 11 अक्टूबर को, उसे परीक्षा देने जाना था। लेकिन आज उसके हाथ में किताब नहीं, मोबाइल है, जिस पर बार-बार एक ही खबर पढ़ी जा रही है: "परीक्षा स्थगित।"

आख़िर हुआ क्या? छत्तीसगढ़ कर्मचारी चयन बोर्ड ने सहायक शिक्षक के 2,292 पदों पर भर्ती के लिए आवेदन मांगे थे। इसकी लिखित परीक्षा 11 अक्टूबर को और शिक्षक पद (1,654 पद) की परीक्षा 25 अक्टूबर को होनी थी। लेकिन परीक्षा से ठीक पहले मामला अदालत पहुँच गया।

व्यापमं ने हाईकोर्ट के 9 अक्टूबर के आदेश का पालन करते हुए 11 अक्टूबर की परीक्षा स्थगित कर दी। बिलासपुर हाईकोर्ट की डिवीजन बेंच ने रोक लगाने के साथ राज्य सरकार को नोटिस जारी कर जवाब माँगा है।

विवाद की जड़: दिव्यांग आरक्षण: पूरा मामला भर्ती विज्ञापन में दिव्यांग आरक्षण से जुड़ा है। याचिका में आरोप है कि विज्ञापन में पूर्णतः दृष्टिबाधित उम्मीदवारों को आरक्षण के दायरे से बाहर रखा गया, जो उनके संवैधानिक अधिकारों का उल्लंघन है। रिपोर्टों के अनुसार अदालत ने 11 सितंबर को हुए संशोधन पर भी सवाल उठाए हैं। सीधी बात यह है कि अदालत चाहती है कि पहले यह तय हो जाए कि नियमों का पालन हुआ या नहीं, उसके बाद ही परीक्षा हो।

अदालत ने "अभी" रोक क्यों लगाई? अक्सर पूछा जाता है कि अदालत परीक्षा के इतने क़रीब आकर रोक क्यों लगाती है। इसके पीछे कुछ वजहें होती हैं: बाद की बड़ी मुसीबत से बचाव: परीक्षा और नियुक्ति के बाद गलती निकले तो नौकरी पाए लोग भी हटाए जा सकते हैं। पहले बीएड डिग्रीधारी 254 सहायक शिक्षकों की नौकरी हाईकोर्ट के फैसले के बाद चली गई थी। ऐसी स्थिति दोबारा न आए, इसलिए गलती पहले ही सुधारना बेहतर माना जाता है। संवैधानिक हक़ की रक्षा: आरक्षण का सवाल संविधान से जुड़ा है, इसलिए अदालत इसे हल्के में नहीं लेती।

पूरी प्रक्रिया की साख: भर्ती तभी भरोसेमंद होती है, जब उसकी बुनियाद साफ़ हो। यानी रोक का मक़सद भर्ती को रोकना नहीं, उसे सही रास्ते पर लाना है। परीक्षा स्थगित होने का अर्थ भर्ती रद्द होना नहीं है।

अभ्यर्थियों पर क्या बीत रही है? 1. मेहनत और पैसे का बोझ: कोचिंग फीस, कमरे का किराया, किताबें और आने-जाने का खर्च, यह सब पहले ही हो चुका है। परीक्षा आगे खिसकी तो खर्च और बढ़ेगा। 2. उम्र की चिंता: जिनकी आयु सीमा के आख़िरी साल चल रहे हैं, उनके लिए हर देरी एक डर है। 3. अनिश्चितता: नई तारीख़ की कोई आधिकारिक सूचना अभी उपलब्ध नहीं है। जब तारीख़ ही न पता हो तो तैयारी की योजना कैसे बने? 4. परिवार का दबाव: घर वाले पूछते हैं, "नौकरी कब लगेगी?" और अभ्यर्थी के पास कोई जवाब नहीं होता।

मन पर असर: जो आँकड़ों में नहीं दिखता मनोविज्ञान की नज़र से देखें तो लंबे इंतज़ार का असर पढ़ाई से ज़्यादा मन पर पड़ता है: तनाव और बेचैनी: नींद उड़ जाती है, खाने का मन नहीं करता। हताशा: लगता है कि इतनी मेहनत का क्या फ़ायदा हुआ।

आत्मविश्वास में गिरावट: बार-बार रुकावट से कुछ छात्र खुद को ही दोष देने लगते हैं, जबकि इसमें उनकी कोई गलती नहीं। व्यवस्था से भरोसा उठना: बार-बार अटकती भर्तियाँ युवाओं का भरोसा तोड़ती हैं। अकेलापन: तुलना और तानों के बीच छात्र अपने मन की बात किसी से कह नहीं पाते।

उम्मीद की दूसरी तस्वीर: इस कहानी का एक सकारात्मक पहलू भी है। जो छात्र इस समय को "एक्स्ट्रा रिविज़न टाइम" मानकर चलेंगे, वे कमज़ोर विषय मज़बूत कर सकते हैं, मॉक टेस्ट दे सकते हैं और परीक्षा में और बेहतर प्रदर्शन कर सकते हैं। शिक्षक और काउंसलर भी यही सलाह देते हैं कि दिनचर्या ठीक रखें, अफ़वाहों से बचें और सिर्फ़ आधिकारिक सूचना पर भरोसा करें।

अब नज़रें किस पर? अब सबकी निगाहें राज्य सरकार के जवाब और अदालत की अगली सुनवाई पर टिकी हैं। अभ्यर्थियों की माँग है कि मामला जल्दी सुलझे, नई तारीख़ पहले से बताई जाए और ज़रूरत हो तो उम्र सीमा में राहत पर विचार हो। अंत में: अदालत का फ़ैसला न्याय के लिए है, और न्याय ज़रूरी भी है। लेकिन इस देरी की क़ीमत वे युवा चुका रहे हैं जिनकी इसमें कोई भूमिका नहीं।

भविष्य की भर्तियों के लिए सबक़ साफ़ है: विज्ञापन निकालने से पहले नियम पूरी तरह जाँचे जाएँ, ताकि किसी का सपना बीच रास्ते में न अटके। परीक्षा की तारीख़ टली है, मेहनत की क़ीमत नहीं।

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