- Post by Admin on Sunday, May 24, 2026
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नीली रोशनी के उस पार
✍️ रजनी जोशी
कृत्रिम रोशनी से
जी भर आया है,
अब मुझे चाहिए
घने अंधकार में टिमटिमाते जुगनुओं की मासूम रोशनी…
वो रोशनी,
जो आँखों में नहीं,
सीधे आत्मा में उतर जाया करती थी।
मुझे चाहिए
घर के आंगन में बैठकर
खुले आसमान के नीचे
तारों से भरी वो शांत रातें,
जहाँ चाँद चुपचाप बातें करता था
और हवाएँ कहानियाँ सुनाया करती थीं।
मुझे चाहिए पूर्णिमा की वो चाँदनी,
जो दूध सी सफेद लगती थी,
जो छतों पर उतरकर
मन की थकान धो दिया करती थी।
जिसे देखकर लगता था कि
प्रकृति अब भी इंसान से प्रेम करती है।
पर अब…
मोबाइल की नीली रोशनी में
चेहरे तो चमकते हैं,
मगर रिश्ते धुंधले पड़ गए हैं।
कंप्यूटर की स्क्रीन पर दुनिया तो सिमट आई है,
लेकिन मन का आकाश कहीं खो गया है।
पूरे शहर में
जगमगाती लाइटें तो हैं,
पर उनमें सुकून नहीं है।
वो रोशनियाँ
अब सिर्फ दीवारों को चमकाती हैं,
दिलों को नहीं।
अब बच्चे
चाँद नहीं देखते,
मोबाइल की बैटरी देखते हैं।
अब रातें तारों से नहीं,
नोटिफिकेशन से जगमगाती हैं।
कभी गाँव की पगडंडियों पर
जुगनू रास्ता दिखाते थे,
आज शहर की सड़कें
हजारों लाइटों के बाद भी अजनबी लगती हैं।
काश…
कोई फिर से लौटा दे
वो मिट्टी की खुशबू,
वो आंगन की शांति,
वो तारों भरी रातें,
और वो सादगी वाली रोशनी
जिसमें इंसान खुद से मिला करता था।
क्योंकि
सच तो यही है
इस चमकती दुनिया में
सब कुछ रोशन होकर भी
बहुत कुछ अंधेरे में खो गया है…।
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