कमलेश यादव : जोधपुर की एक शांत सी सुबह थी…सूरज धीरे-धीरे अपनी रोशनी फैला रहा था, लेकिन उसी रोशनी के बीच एक ऐसी कहानी भी जन्म ले रही थी, जो दिल को छू लेने वाली थी। यह कहानी है रजनी वरवानी की…एक ऐसी महिला, जिनके जीवन में दर्द कम नहीं थे, विकलांगता की चुनौती, रिश्तों का टूटना, और अकेलेपन का सामना…लेकिन इन सबके बावजूद उन्होंने खुद को नहीं, बल्कि दूसरों को संवारने का रास्ता चुना।

एक दिन, उन्हें कविता अरोड़ा के माध्यम से एक छोटी सी संस्था के बारे में पता चला “चक्षुहीन सेवा समिति”, जिसे रामचंद्र जी चलाते हैं। यह कोई बड़ी संस्था नहीं थी…एक साधारण सा किराए का मकान, जहां लगभग 25 दृष्टिहीन लोग रहते थे।ना सरकारी मदद… ना कोई बड़ा सहारा…बस रामचंद्र जी की नौकरी की सैलरी और उनका बड़ा दिल।

जब रजनी वहां पहुंचीं…तो उन्होंने देखा—आंखों में रोशनी नहीं थी… लेकिन चेहरों पर उम्मीद अब भी जिंदा थी। उस पल… कुछ बदल गया। उन्होंने सोचा—"अगर मैं इनकी जिंदगी में थोड़ी सी रोशनी ला सकूं… तो शायद मेरी जिंदगी का दर्द भी हल्का हो जाएगा।"

फिर क्या था…रजनी वरवानी ने बिना देर किए काम शुरू कर दिया। कंबल दिए, बिस्तर पहुंचाए,राशन की व्यवस्था की लेकिन उन्होंने सिर्फ मदद नहीं की…उन्होंने समाज को भी इस दर्द से जोड़ने का काम किया। उन्होंने वीडियो बनाए…सोशल मीडिया पर डाले…और लोगों से अपील की—"आइए, इनकी दुनिया को थोड़ा आसान बनाते हैं…"

एक दिन उन्हें पता चला कि संस्था की दीवारें भी मदद मांग रही हैं…रंग-रोगन की जरूरत है। फिर उन्होंने एक और अपील की…और इस बार आवाज पहुंची सतकर्म ग्रुप तक, जहां वो खुद भी सदस्य थीं।ग्रुप की एडमिन प्रिया जैन के नेतृत्व में सभी लोग आगे आए…और देखते ही देखते, उस सूने से घर में रंग भर गए।

फिर आया होली का त्योहार…इस बार रंग सिर्फ दीवारों पर नहीं…दिलों में भी बिखरने वाले थे।सतकर्म ग्रुप ने मिलकर राशन, बिस्किट, आटा और जरूरी सामान पहुंचाया…और उन दृष्टिहीन भाइयों-बहनों के साथ मिलकर होली मनाई।

उस दिन का दृश्य कुछ अलग ही था…हारमोनियम की धुन…तबले की ताल…और उन आवाजों में छुपी एक गहरी खुशी…आंखें नहीं थीं…लेकिन एहसास इतने गहरे थे कि हर सुनने वाला भावुक हो जाए।

रजनी एक कोने में खड़ी थीं…शांत… लेकिन संतुष्ट। शायद उस दिन उन्होंने महसूस किया “खुशी पाने का सबसे आसान रास्ता है… किसी और के चेहरे पर मुस्कान लाना।”

आज, रजनी वरवानी की यह सेवा सिर्फ मदद नहीं…एक मिसाल बन चुकी है। वो कहती हैं “जहाँ भी जरूरत दिखे… बस आगे बढ़कर मदद करिए… क्योंकि यही सच्ची इंसानियत है।”

कभी-कभी जिंदगी हमें तोड़ने की कोशिश करती है…लेकिन कुछ लोग ऐसे होते हैं… जो टूटकर भी… दूसरों को जोड़ने में लग जाते हैं।रजनी वरवानी उन्हीं में से एक हैं।

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