विविधा
हे मानव तू अपना भूख शांत कर पर मुझे जान से मत मार ! मुझे भी दर्द होता है मुझमें भी जान बसती है ...
गांव की गलियों में बच्चे भीगते हुए दौड़ लगाते हैं, कागज की नावें बनाकर नालियों में तैराते हैं। पेड़ों की डालियों पर झूले पड़ जाते हैं और युवतियां "सावन के झूले" गाते हुए झूला झूलती हैं।
खुमान साव संगीत अकादमी (राष्ट्रपति पुरस्कृत ) के संस्थापक लोक कलाकार गोविंद साव पिछले कई वर्षों से इस सांस्कृतिक विरासत को सहेजने और आगे बढ़ाने में जुटे हैं। उन्होंने अपने जीवन का बड़ा हिस्सा कड़ी साधना और अनुशासन में समर्पित किया, ताकि छत्तीसगढ़ की लोक संगीत परंपरा नई पीढ़ी तक पहुंच सके।
जन्म से मृत्यु तक मानव जीवन के हर पड़ाव पर गीत साथ चलते हैं लोरी से लेकर विवाह के मंगलगीत तक। छत्तीसगढ़ के सुप्रसिद्ध गीतकार चंपेश्वर गोस्वामी के गीतों में इसी लोकजीवन की विविधता और गहराई देखने को मिलती है।
इन पुस्तकों में ग्रामीण पृष्ठभूमि पर केंद्रित छत्तीसगढ़ी उपन्यास "बड़े दाऊजी"लेखक डॉ.डी.पी.देशमुख,"सोनहा माटी"डॉ.दीनदयाल साहू कृत एवं डॉ.गिरधर चंद्रा द्वारा लिखित दो हिंदी काव्य संग्रह "अंतर्मन का शब्द"व " भावों की अभिव्यक्ति" शामिल है।