- Post by Admin on Thursday, Sep 10, 2026
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उज्जैन के खड़े हनुमान जी की चर्चा देश भर में हो रही है. पिछले 4 दिन से प्रशासन भारी क्रेन और जेसीबी की मदद से इन्हें शिफ्ट करने की कोशिश में है, लेकिन मशीनें इस प्रतिमा को हिला तक नहीं पाई हैं. कोई इसे चमत्कार मान रहा है तो कोई कह रहा है कि हनुमान जी यहां से शिफ्ट नहीं होना चाहते. प्रशासन की ओर से मंदिर की छत और दीवारें पहले ही तोड़ी जा चुकी हैं. प्रतिमा को बचाने के लिए फिलहाल यहां टेंट की व्यवस्था की गई है. अब प्रशासन ने ASI की टीम को लगाया है जो ये पता करेगी कि आखिर प्रतिमा अपनी जगह से टस से मस क्यों नहीं हो रही.
मध्य प्रदेश के उज्जैन में सिंहस्थ कुंभ की तैयारियां शुरू हो गई हैं. इसी को लेकर कंठान-छत्री रोड पर सड़क का चौड़ीकरण प्रस्तावित है. यहां रास्ते में खड़े हनुमान जी का मंदिर था. नगर निगम ने इसे शिफ्ट करने की योजना बनाई. 4 और 5 सितंबर को नगर निगम की टीम ने हथौड़े से मंदिर की दीवारों और छत को हटा दिया.जब हनुमान जी की प्रतिमा हटाने की बारी आई तो काफी मशक्कत के बाद ही इसे हिलाया नहीं जा सका. प्रशासन की ओर से चार दिन में चार बार प्रतिमा को खिंसकाने की कोशिश की गई है, जिसे देखकर प्रशासन ने हाथ खड़े कर दिए हैं.
ASI के अधिकारियों की एंट्री नगर निगम ने फिलहाल ASI के अधिकारियों को बुलाया है. बताया जा रहा है कि ये प्रतिमा तकरीबन 170 साल पुरानी हो सकती है. हालांकि संभावना जताई जा रही है कि परमार वंश या राजा भोज के शासनकाल के दौरान मंदिर का निर्माण कराया गया हो. अगर ये बात सच होती है तो प्रतिमा तकरीबन एक हजार साल पुरानी होगी. इसीलिए प्रतिमा की सुरक्षा के लिए खास सावधानी बरती जा रही है.
मंदिर का ढांचा हटाया जा चुका है, ऐसे में मूर्ति सुरक्षित रखने के लिए टेंटनुमा कैनोपी लगाई गई है. माना ये जा रहा है कि प्रतिमा मजबूत नींव पर टिकी है. ASI अधिकारियों को बुलाने की क्यों पड़ी जरूरत खड़े हनुमान जी की प्रतिमा तकरीबन 8 फुट की है, हालांकि ये क्लीयर नहीं है कि ये जमीन के अंतर कितनी है. प्रशासन ने अभी तक जो अंदाजा लगाया है उस हिसाब से हनुमान जी मजबूत नींव पर जमे हैं. एक अनुमान ये भी लगाया गया है कि किसी बड़े पत्थर को तराशकर हनुमान जी की मूर्ति बनाई गई है.
वो पत्थर जमीन में काफी गहराई तक हो सकता है. ऐसा इसलिए क्योंकि नगर निगम ने अभी तक तकरीबन डेढ़ फीट की खोदाई करा ली है, ताकि इसकी नींव का पता चल सके, मगर कोई जानकारी न होने पर ASI टीम बुलाई गई. अब पुरातत्व विभाग की टीम ग्राउंड स्कैनिंग तकनीक से प्रतिमा के बारे में पता लगाएगी. क्या करेगी पुरातत्व विभाग की टीम ऐसे मामलों में सबसे पहले भारतीय पुरातत्व की टीम साइंटिफिक स्कैनिंग करती है. इसके लिए ग्राउंड पेनिट्रेटिंग रडार तकनीक का प्रयोग किया जाता है.
इसके तहत जमीन के अंदर रेडियो फ्रीक्वेंसी भेजी जाती है. जब ये मिट्टी की परत से टकराती हैं तो वापस सतह पर लौटती हैं. रिसीवर इनसे जमीन का एक मैप बना देता है. इससे प्रतिमा के आंतरिक हिस्से और जमीन के नीचे उसके फाउंडेशन की संरचना समझ आ जाती है. इसके अलावा 3D लेजर स्कैनिंग से ये पता लगाया जाता है कि प्रतिमा जमीन में कितनी गहराई तक जमी है.
अधिकारी प्रतिमा की बनावत की जांच कर ये भी पता लगाने की कोशिश करेंगे कि ये किस समय की है या कितनी पुरानी है. फिलहाल प्रतिमा के बेसाल्ट पत्थर से बने होने के बारे में पता लगा है, जिससे इसके राजा भोज के समय के होने की संभावना ज्यादा नजर आ रही है. प्रतिमा की गहराई का पता लगाकर ASI अपनी रिपोर्ट देगी उस आधार पर ही प्रतिमा को शिफ्ट किया जाएगा.
ASI की सहमति से ही होगी शिफ्टिंग पुरातत्व विभाग की टीम सबसे पहले ये पता लगाती है कि प्रतिमा कितनी पुरानी है? प्रतिमा का संबंध किस ऐतिहासिक काल या राजवंश है. अगर प्रतिमा ज्यादा पुरानी हुई तो क्या उसे संरक्षित विरासत के तौर पर रखा जा सकता है. टीम ये भी देखेगी कि प्रतिमा के आसपास कोई पुरातात्विक अवशेष तो मौजूद नहीं.
ASI की टीम वैज्ञानिक जांच के बाद बताएगा कि प्रतिमा हटाना संभव भी है या नहीं टीम की सहमति के बाद ही प्रतिमा को हटाया जाएगा, ASI ही ये बताएगा की इसे कैसे हटाया जाए. अगर प्रतिमा ज्यादा पुरानी निकलती है तो ASI वैकल्पिक मार्ग तलाशने का विकल्प भी दे सकता है.
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