कमलेश यादव : बच्चे खेलते-खेलते ही सबसे बड़े वैज्ञानिक बन जाते हैं। लट्टू बिना गिरे कैसे घूमता है, गुलेल में खिंचाव कहाँ से आता है, पानी के गिलास में चम्मच टेढ़ा क्यों दिखता है ये सब रोज़मर्रा के रोचक विज्ञान के सवाल हैं। छत्तीसगढ़ के मोहला-मानपुर-अंबागढ़ चौकी जिले के शासकीय पूर्व माध्यमिक शाला, जबकसा के शिक्षक राजेन्द्र ठाकुर बच्चों को यही विज्ञान खेल-खेल में सिखा रहे हैं। विज्ञान शिक्षक पुरानी साइकिल की डायनेमो से बिजली बनाकर बल्ब रोशन करना, कागज की नाव को फूँक से चलाना और गुब्बारे से रॉकेट उड़ाना जैसे प्रयोग करवाते हैं। उनके लिए ये खिलौने नहीं, बल्कि विज्ञान को दैनिक जीवन से जोड़ने की प्रयोगशाला है।

कौन हैं शिक्षक राजेन्द्र ठाकुर

राजेन्द्र ठाकुर सिर्फ एक शिक्षक का नाम नहीं, उस वनांचल का जवाब है जो कभी डर में जीता था। एक शिक्षक जो मानता है कि पूरा ब्रह्मांड किताबों के पन्नों में छिपा है, बस उसे देखने की नज़र चाहिए और यही नज़र वे अपने हर विद्यार्थी की आँखों में भरने की कोशिश करते हैं। साधनों की कमी को उन्होंने कभी रुकावट नहीं, बल्कि नए रास्ते खोजने की चुनौती माना। बदलाव लाने के लिए बड़े संसाधनों से ज़्यादा ज़रूरी है ईमानदार मेहनत और अटूट विश्वास और अगर एक शिक्षक ठान ले, तो वह अकेले ही पूरे समाज की तस्वीर बदल सकता है।

राजेन्द्र ठाकुर के इस अनोखे प्रयास को राज्य और देश, दोनों स्तर पर सराहा गया। उन्हें राज्य स्तर पर "नवाचारी शिक्षा रत्न सम्मान" मिला, तो गुजरात के ऊँझा में उन्हें "सरदार पटेल राष्ट्रीय इनोवेटिव टीचर अवार्ड" से नवाज़ा गया। अब साल 2027 के राज्यपाल पुरस्कार के लिए भी उनके नाम की घोषणा हो चुकी है। ये सम्मान सिर्फ एक शिक्षक की उपलब्धि नहीं, बल्कि पूरे मोहला-मानपुर-अंबागढ़ चौकी जिले को गौरवान्वित कर रहा हैं।

राजेन्द्र जी का मानना है कि विज्ञान सिर्फ परीक्षा पास करने का जरिया नहीं, बल्कि रोजमर्रा की ज़िंदगी को आसान बनाने की चाबी है। इसीलिए उन्होंने पढ़ाई का तरीका ही बदल डाला। बच्चों को उन्होंने घर में मिलने वाली आम चीज़ों से माइक्रोस्कोप बनाना सिखाया, जिससे बच्चे पहली बार अपनी आँखों से पानी की एक बूँद में तैरते जीव-जंतु देख पाए। कबाड़ में पड़े पुर्जों से पवन चक्की बनाकर उन्होंने दिखाया कि हवा से भी बिजली बन सकती है।

शिक्षक राजेन्द्र जी बताते है कि, पिता स्व. नवलु राम ठाकुर हमेशा कहा करते थे कि शिक्षा से बड़ी कोई दौलत नहीं होती। घर में साधन भले सीमित रहे हों, लेकिन सपने कभी छोटे नहीं रखे गए। पिता की यही सीख राजेन्द्र जी के मन में गहरे बैठ गई। उन्होंने ठान लिया कि गाँव के बच्चे भी वही ऊँचाइयाँ छू सकते हैं, जो बड़े शहरों के बच्चे छूते हैं बस उन्हें मौका और सही दिशा चाहिए। आज जब मानपुर के बच्चे राज्य और राष्ट्रीय स्तर की विज्ञान प्रतियोगिताओं में मेडल लेकर लौटते हैं, तो मानो पिता का वह अधूरा सपना बेटे के ज़रिए साकार हो उठता है।

टूटी-फूटी चीज़ों, बेकार पड़े सामान और आसपास मिलने वाली वस्तुओं से उन्होंने पूरी एक प्रयोगशाला खड़ी कर दी। नतीजा यह हुआ कि जो विषय बच्चों को सबसे कठिन और डरावना लगता था, वही अब उनका सबसे पसंदीदा विषय बन गया है। उनकी यह सोच एक सीधी-सी बात समझाती है बड़ा सपना देखने के लिए बड़े शहर की ज़रूरत नहीं होती, बड़ी सोच की ज़रूरत होती है।

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