- Post by Admin on Wednesday, Sep 02, 2026
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सत्यदर्शन लाइव डेस्क : जीवन कई बार ऐसे मोड़ पर लाकर खड़ा कर देता है, जहां हार मान लेना सबसे आसान रास्ता लगता है। लेकिन 57 वर्षीय जावित्री शाक्य की कहानी इस धारणा को पूरी तरह बदल देती है। मुंह के उन्नत चरण के कैंसर से जूझने के बाद, जब उनका शरीर बुरी तरह कमजोर हो चुका था, तब किसी ने कल्पना भी नहीं की होगी कि यही महिला आगे चलकर पावरलिफ्टिंग की दुनिया में अपनी पहचान बनाएगी।
इलाज के दौरान जावित्री को लंबे समय तक केवल तरल आहार पर रहना पड़ा। इस दौरान उनकी मांसपेशियां लगातार कमजोर होती गईं, यहां तक कि पिंडली की मांसपेशी भी क्षीण हो गई। हालात इतने कठिन हो गए थे कि बिना सहारे के बैठना भी उनके लिए एक बड़ी चुनौती बन गया था।
सामान्य दिनचर्या की सबसे छोटी गतिविधियां भी उन्हें थका देती थीं, और आने वाला हर दिन एक नई परीक्षा जैसा महसूस होता था। इन विपरीत परिस्थितियों के बावजूद जावित्री ने ठान लिया था कि वह बीमारी को अपने जीवन पर हावी नहीं होने देंगी। इस संकल्प के साथ उन्होंने धीरे-धीरे अपनी खोई हुई ताकत को वापस पाने की दिशा में कदम बढ़ाना शुरू किया।
इस पूरी यात्रा में उनके बेटे का साथ उनकी सबसे बड़ी ताकत बना, जिसने हर कठिन दिन में उनका हौसला बनाए रखा। रिकवरी की यह प्रक्रिया कोई रातोंरात हासिल होने वाली उपलब्धि नहीं थी। यह धैर्य, निरंतरता और छोटे-छोटे प्रयासों पर टिकी एक लंबी यात्रा थी, जिसमें हर छोटी सफलता उन्हें अगला कदम उठाने का हौसला देती गई।
समय के साथ यह सामान्य पुनर्वास प्रक्रिया धीरे-धीरे शक्ति प्रशिक्षण के प्रति एक सच्चे जुनून में तब्दील हो गई। महीनों और फिर वर्षों की मेहनत के बाद जावित्री का शरीर वह ताकत हासिल करने लगा, जिसकी उन्होंने कभी कल्पना भी नहीं की थी। जो शरीर कभी कैंसर की वजह से बुरी तरह क्षतिग्रस्त हो चुका था, वह अब एक नए, मजबूत रूप में ढल रहा था। इस पूरे सफर में उनके बेटे का सहयोग हर पड़ाव पर उनके साथ रहा।
आज जावित्री शाक्य 80 किलोग्राम वजन के साथ डेडलिफ्ट करने में सक्षम हैं यह उपलब्धि उनकी शुरुआती स्थिति को देखते हुए और भी असाधारण बन जाती है। जो महिला कभी सीधे बैठने में भी संघर्ष करती थी, वह आज उतना भार उठाती है जिसे देखकर कई युवा भी हिचकिचाएं।
उनकी यह यात्रा साबित करती है कि इंसानी इच्छाशक्ति के आगे शारीरिक सीमाएं भी घुटने टेक सकती हैं। 57 वर्ष की आयु में जावित्री की यह कहानी केवल पावरलिफ्टिंग की उपलब्धि भर नहीं है, बल्कि यह जीवन में आए सबसे कठिन मोड़ के बाद नए सिरे से खुद को गढ़ने की मिसाल है। मुंह के गंभीर कैंसर से जूझने से लेकर 80 किलो का भार उठाने तक का उनका सफर यह संदेश देता है कि असली ताकत केवल शरीर में नहीं, बल्कि हर ठोकर के बाद फिर खड़े होने के जज्बे में होती है।
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