कमलेश यादव : यदि आप किसी व्यक्ति में जिद, जिजीविषा, जीवटता और जीवंतता का सही संयोजन देखना चाहते हैं, तो आपको राजनांदगांव के डॉक्टर विजय ठाकुर से जरूर परिचित होना चाहिए।डॉक्टर साहब किसी भी समय ,चाहे रात हो या दिन, मरीज़ की मदद के लिए दौड़े चले आते हैं।यही निःस्वार्थ सेवा, यही समर्पण उसे समाज का सबसे सम्मानित और भरोसेमंद किरदार बनाता है एक ऐसा हीरो जिसके लिए इंसान की जान से ज़्यादा ज़रूरी कुछ नहीं है।

गौरतलब है कि, छत्तीसगढ़ के राजनांदगांव जिले में "तुलसी क्लिनिक" ने वर्षों में हज़ारों कहानियां लिखी हैं, पर हर कहानी का लेखक एक ही रहा करुणा। शहर में डॉक्टरों की कमी नहीं, अस्पतालों की कतार लंबी है, पर डॉक्टर विजय के नाम के साथ जुड़ता है एक खास पहचान वह डॉक्टर जो मरीज़ को कभी हारने नहीं देता। वह सिर्फ बीमारी का इलाज नहीं करता, बल्कि टूटे हुए हौसले को फिर से जोड़ता है, डर में बैठे मरीज़ को भरोसा देता है और परिवारों की मुस्कान लौटाता है।

यह कहानी शुरू होती है शहर के श्रमिक बाहुल्य वार्ड से जहां दीवारों पर कोई शानो-शौकत नहीं टंगी थी, बल्कि एक अनकहा संस्कार बहता था, "सेवा परमो धर्म"। दशकों बाद भी, अपने पिता के पदचिन्हों पर चलते हुए, डॉक्टर विजय की सुबह उसी एक वाक्य के साथ खुलती है, जैसे वह कोई प्रार्थना हो, कोई प्रण हो, जिसे रोज़ नए सिरे से निभाना है।

पर डॉक्टर विजय की चिकित्सा सिर्फ स्टेथोस्कोप तक सीमित नहीं। उनका मानना है कि तन की बीमारी तो दवा से ठीक हो जाती है, मगर मन के भीतर जो एक अनदेखा रोग बैठा है - भय - उसका कोई नुस्खा किताबों में नहीं लिखा। उसे मिटाने की दवा वे खुद तैयार करते हैं, हर दिन, हर मरीज़ के लिए अलग दो मीठे बोल, एक भरोसे भरी मुस्कान, और यह यकीन कि "सब ठीक हो जाएगा।" यही वह नुस्खा है, जो टूटे हुए मन के तारों को चुपचाप फिर से जोड़ देता है।

इतनी सेवा के बावजूद जब उनसे पूछा जाता है कि इतनी ताकत कहां से आती है, तो उनका जवाब बड़ा सादा होता है - यह सब ऊपरवाले की मेहरबानी है, मैं तो बस एक ज़रिया हूं। यह विनम्रता, यह अहंकार-शून्य समर्पण, उन्हें भीड़ से अलग खड़ा करता है। एक हाथ जो हर रोज़ ज़िंदगियां बचाता है, वही हाथ हर शाम ईश्वर का शुक्रिया अदा करता है - यही शायद सेवा की सच्ची परिभाषा है।

फिर आया वह दौर, जब पूरी दुनिया सांसों के लिए तरस रही थी। कोरोना के समय में, जब अपने भी अपनों से मुंह मोड़ रहे थे, डॉक्टर विजय ने रात और दिन का फर्क मिटा दिया। वे मोर्चे पर डटे रहे, बिना यह सोचे कि खुद पर क्या बीतेगी। इलाज तो किया ही, साथ ही जिनके घर चूल्हा नहीं जल रहा था, उनका सहारा भी बने। वह दौर सिखा गया कि असली डॉक्टर वही है जो जरूरत के समय काम भी आए।

आज जब दुनिया भीड़ में भी अकेली होती जा रही है, जब रिश्ते सिर्फ स्क्रीन पर सिमटते जा रहे हैं, डॉक्टर विजय ठाकुर की यह सोच एक रोशनी की तरह राह दिखाती है - हमें एक-दूसरे का सहारा बनना है। उनकी यह कहानी हमें सिखाती है कि दवा शरीर को ठीक करती है, पर इंसानियत रूह को। यही कारण है कि डॉक्टर को धरती पर भगवान का दूसरा रूप कहा जाता है क्योंकि जहाँ उम्मीद टूटने लगती है, वहीं से डॉक्टर की सेवा और समर्पण नई राह दिखाना शुरू करते हैं।

सत्यदर्शन लाइव की ओर से डॉक्टर विजय ठाकुर को सलाम वह चिकित्सक जिसने साबित किया कि सेवा सिर्फ पेशा नहीं, इबादत है।

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