सत्यदर्शन लाइव विशेष : कभी-कभी बदलाव लाने के लिए बड़ी सरकारी योजनाओं की नहीं, बल्कि एक ज़िद्दी सपने और कुछ साथी हाथों की ज़रूरत होती है। असम की डॉ. पूर्णिमा देवी बर्मन ने यही करके दिखाया। आज जब लुप्तप्राय पक्षियों को बचाना दुनिया भर की सरकारों के लिए चुनौती बना हुआ है, वहीं इस एक महिला ने गांव-गांव घूमकर, महिलाओं को साथ जोड़कर, विलुप्त होती सारस प्रजाति को नया जीवन दे दिया है।

जड़ें प्रकृति से जुड़ी थीं : पूर्णिमा का बचपन असम के कामरूप इलाके के एक गांव में अपने दादा-दादी के साथ बीता, जो ब्रह्मपुत्र के किनारे खेती करते थे। खेतों में उनके साथ जाना, पक्षियों को क़रीब से देखना और दादी से पक्षियों से जुड़े पारंपरिक गीत सीखना यहीं से प्रकृति के प्रति उनका गहरा लगाव बन गया, जो आगे चलकर उनके जीवन का मक़सद बना।

जब शोध ने दिखाई असली तस्वीर: गुवाहाटी विश्वविद्यालय से जीव विज्ञान में एमएससी करने के बाद 2007 में उन्होंने सारस (जिसे पूर्वोत्तर में 'हरगिला' कहा जाता है) पर पीएचडी शोध शुरू किया। शोध के दौरान उन्होंने पाया कि यह पक्षी विलुप्ति के कगार पर है, और इसकी एक बड़ी वजह अंधविश्वास है लोग इसे अशुभ मानते थे और इनके घोंसलों वाले पेड़ तक काट डालते थे। एक गांव में तो उन्होंने ख़ुद देखा कि एक पेड़ काटा जा रहा था और उसमें से सारस के बच्चे गिर रहे थे। यही दृश्य उनके लिए मोड़ बन गया उन्होंने रिसर्च से आगे बढ़कर मैदान में उतरने का फ़ैसला किया।

जन्म हुआ 'हरगिला आर्मी' का: पूर्णिमा को एहसास हुआ कि गांव की महिलाएं संस्कृति और परंपराओं से गहरे जुड़ी होती हैं, इसलिए बदलाव की शुरुआत उन्हीं से करनी होगी। इस सोच के साथ उन्होंने बनाई 'हरगिला आर्मी' पूरी तरह महिलाओं की एक टोली, जो आज बढ़कर 10,000 से ज़्यादा महिलाओं तक पहुंच चुकी है। ये महिलाएं गीत, नुक्कड़ नाटक और सामूहिक नृत्य के ज़रिए गांव-गांव जागरूकता फैलाती हैं, घायल सारसों की देखभाल करती हैं, और बरसात में पेड़ों से गिर पड़े बच्चों को बचाती हैं।

सारस के जन्म के मौसम में अब पूरा समुदाय उत्सव मनाता है वही पक्षी, जिसे कभी अपशगुन समझा जाता था। इस अभियान का एक ख़ूबसूरत पहलू यह भी है कि महिलाओं ने सारस के डिज़ाइन वाले कपड़े बनाना शुरू किया, जिससे जागरूकता के साथ-साथ उनकी आर्थिक आत्मनिर्भरता भी बढ़ी।

नतीजे बोलते हैं: 2007 में जब यह अभियान शुरू हुआ, कामरूप ज़िले में केवल 28 घोंसले बचे थे। 2019 तक यह संख्या बढ़कर 220 घोंसलों और क़रीब 600 सारस पक्षियों तक पहुंच गई। पेड़ काटने की प्रथा लगभग ख़त्म हो गई, और सारस अब गांवों में सम्मान और गर्व का प्रतीक बन चुका है।

दुनिया ने माना लोहा: डॉ. पूर्णिमा देवी बर्मन के इस असाधारण योगदान को दुनिया भर में सराहा गया है: 2015 — कंज़र्वेशन लीडरशिप प्रोग्राम लीडरशिप अवॉर्ड 2016 — यूएनडीपी इंडिया बायोडायवर्सिटी अवॉर्ड और आरबीएस अर्थ हीरो अवॉर्ड 2017 — व्हिटली अवॉर्ड (ग्रीन ऑस्कर) और फिक्की एफएलओ वीमन अचीवर पुरस्कार 2018 — भारत के राष्ट्रपति द्वारा नारी शक्ति पुरस्कार 2022 — संयुक्त राष्ट्र पर्यावरण कार्यक्रम का सर्वोच्च सम्मान, 'चैंपियन ऑफ द अर्थ' (एंटरप्रेन्योरियल विज़न श्रेणी)

एक प्रेरणा, जो हर किसी के लिए है : डॉ. पूर्णिमा देवी बर्मन की कहानी सिर्फ़ एक पक्षी को बचाने की कहानी नहीं है यह इस बात का प्रमाण है कि जब महिलाएं एकजुट होकर ठान लें, तो बड़े से बड़ा बदलाव भी संभव है। उन्होंने साबित कर दिया कि संरक्षण और सशक्तीकरण साथ-साथ चल सकते हैं, और एक व्यक्ति का संकल्प पूरे समुदाय की सोच बदल सकता है।

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