- Post by Admin on Tuesday, Sep 01, 2026
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गोविंद साव : भावनगर जिले के गोरखी गांव के एक छोटे से घर में एक बच्चा पढ़ाई कर रहा था, जब एक सर्कस मंडली उसके दरवाजे पर आ पहुंची। बौनेपन के कारण मुश्किल से तीन फुट कद के गणेश को देखकर मंडली वालों की आंखों में सिर्फ एक "आकर्षण" नजर आया, और उन्होंने उसके पिता को पांच लाख रुपये का प्रस्ताव दे डाला। लेकिन सीमित संसाधनों में आठ बच्चों को पालने वाले उस किसान पिता ने बिना एक पल गंवाए यह प्रस्ताव ठुकरा दिया। पैसा नहीं, उन्होंने अपने बेटे के भविष्य को चुना और यही फैसला आगे चलकर एक असाधारण कहानी की नींव बना।
गणेश का सपना डॉक्टर बनने का था, और उन्होंने उसे सिर्फ सपना नहीं रहने दिया। बारहवीं में 87 प्रतिशत अंक और NEET 2018 में इतने अंक हासिल किए कि मेडिकल कॉलेज के दरवाजे उनके लिए खुलने चाहिए थे। मगर व्यवस्था ने एक अलग ही परीक्षा उनके सामने रख दी। भारतीय चिकित्सा परिषद ने उनकी ऊंचाई और शारीरिक सीमाओं का हवाला देकर एमबीबीएस में दाखिला देने से मना कर दिया, यह मानते हुए कि वे आपातकालीन स्थितियों को संभाल नहीं पाएंगे। बरसों की मेहनत को एक फैसले में समेट दिया गया।
लेकिन जिस बच्चे को पिता ने कभी सर्कस के हवाले नहीं होने दिया, वह हार मानने वालों में से नहीं था। नीलकंठ विद्यापीठ के प्रधानाचार्य दलपत कटारिया के सहयोग से गणेश ने जिला कलेक्टर से लेकर राज्य के शिक्षा मंत्री तक, हर दरवाजा खटखटाया। गुजरात हाईकोर्ट ने भी परिषद के फैसले को बरकरार रखा, पर गणेश रुके नहीं। उन्होंने अस्थायी तौर पर बीएससी में दाखिला ले लिया और साथ ही अपनी लड़ाई सुप्रीम कोर्ट तक पहुंचा दी। हौसला वहीं होता है, जहां हार मानने का मन कभी न बने।
22 अक्टूबर 2018 का दिन गणेश और उन जैसे लाखों लोगों के लिए एक मील का पत्थर साबित हुआ। सुप्रीम कोर्ट ने साफ शब्दों में कहा कि केवल कद-काठी के आधार पर किसी को चिकित्सा शिक्षा से वंचित नहीं किया जा सकता। चूंकि उस साल की प्रवेश प्रक्रिया पूरी हो चुकी थी, कोर्ट ने आदेश दिया कि उन्हें अगले बैच में सीट दी जाए। यह सिर्फ एक व्यक्ति की जीत नहीं थी, बल्कि इस सोच पर चोट थी कि क्षमता शरीर की ऊंचाई से मापी जाती है।
2019 में गणेश ने भावनगर के उसी सरकारी मेडिकल कॉलेज में दाखिला लिया, जिस शहर ने कभी उन्हें अयोग्य करार दिया था। कक्षाओं में, प्रैक्टिकल सेशन में, अस्पताल की कठिन ड्यूटी में हर जगह उन्होंने अपने साथियों जैसा ही प्रदर्शन किया, कई बार उससे भी बेहतर। शिक्षकों और सहपाठियों का साथ मिला, लेकिन असली जवाब उन्होंने अपने काम से दिया। जिस परिषद ने कभी उन्हें अयोग्य समझा था, गणेश ने उसकी सोच को अदालत के फैसले से नहीं, बल्कि कक्षा और वार्ड में अपनी मेहनत से गलत साबित किया।
गणेश ने अपनी शारीरिक बनावट को कभी कमजोरी नहीं, बल्कि एक खूबी की तरह इस्तेमाल किया। छोटे बच्चों के मरीज उनसे झिझकते नहीं थे बल्कि वे अपनी छोटी-छोटी तकलीफें उनसे उतनी सहजता से साझा करते, जितनी शायद ही किसी और डॉक्टर से करते। जो कद कभी उनकी योग्यता पर सवाल बना था, वही अब उनके और उनके मरीजों के बीच भरोसे का पुल बन गया।
27 नवंबर 2025 को, मेडिकल काउंसिल द्वारा पहली बार ठुकराए जाने के ठीक सात साल बाद, डॉ. गणेश बरैया ने भावनगर के सर तख्तसिंहजी जनरल अस्पताल में द्वितीय श्रेणी चिकित्सा अधिकारी के रूप में कार्यभार संभाला उसी शहर में, जिसने कभी उन्हें चिकित्सा के लायक नहीं समझा था। आज हर सुबह जब वे स्टेथोस्कोप गले में डालकर अस्पताल के गलियारे में कदम रखते हैं, तो वह सिर्फ एक डॉक्टर की ड्यूटी नहीं, बल्कि यह संदेश भी साथ लेकर चलते हैं कि हौसला शरीर की ऊंचाई का मोहताज नहीं होता।
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