- Post by Admin on Wednesday, Apr 08, 2026
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कमलेश यादव : खैरागढ़ की शांत फिजाओं में एक सपना आकार ले रहा था..रंगों, सुरों और भावों से सजा हुआ एक सपना। इंदिरा कला संगीत विश्वविद्यालय के पाँच युवा कलाकार अपनी साधना को दुनिया के मंच तक ले जाने की तैयारी में थे। उनके भीतर सिर्फ प्रतिभा नहीं, बल्कि भारत की संस्कृति को दुनिया तक पहुँचाने का जुनून भी था।
फिर वो दिन आया, जब ये कलाकार हजारों किलोमीटर दूर थाईलैंड की धरती पर उतरे। एक अनजान देश, नई भाषा, नई संस्कृति… लेकिन दिल में वही भारत की मिट्टी की खुशबू और आत्मविश्वास की चमक। जैसे ही वे मंच के पास पहुँचे, हर कदम के साथ उनका सपना हकीकत में बदलता जा रहा था।
महासाराखाम विश्वविद्यालय में आयोजित चौथे अंतरराष्ट्रीय कला एवं संस्कृति सतत विकास सम्मेलन (ICACSD4) और तीसरे अंतरराष्ट्रीय नृत्य महोत्सव का भव्य मंच रोशनी से जगमगा रहा था। दुनिया भर से आए कलाकारों के बीच जब भारत की बारी आई, तो वातावरण में एक अलग ही ऊर्जा महसूस होने लगी।
मो. आसिफ हुसैन, राजेंद्र कुमार, तोषिता असाटी, मधुश्मिता पॉल और एक्कलक नू नगियोन ने जैसे ही अपनी प्रस्तुतियाँ शुरू कीं, हर नजर उन पर टिक गई। उनके हर भाव, हर सुर और हर कदम में भारतीय संस्कृति की गहराई झलक रही थी। ऐसा लग रहा था जैसे भारत की आत्मा स्वयं उस मंच पर जीवंत हो उठी हो।
सम्मेलन की थीम “कला एवं संस्कृति: कृत्रिम बुद्धिमत्ता के युग में सृजन की पुनर्परिभाषा” पर जब उन्होंने अपने विचार और प्रस्तुतियाँ दीं, तो उन्होंने साबित कर दिया कि तकनीक के इस दौर में भी कला की आत्मा मानव संवेदनाओं में ही बसती है। दर्शकों और आयोजकों ने उनकी विद्वता और प्रस्तुति की दिल खोलकर सराहना की।
इन कलाकारों की इस सफलता के पीछे उनके गुरु डॉ. मेदिनी होंबल का मार्गदर्शन भी मजबूती से खड़ा था। उनके सिखाए हर सुर, हर लय और हर भाव ने इस मंच पर अपना असर दिखाया। यह सिर्फ विद्यार्थियों की नहीं, बल्कि गुरु-शिष्य परंपरा की भी जीत थी।
जब कार्यक्रम समाप्त हुआ, तो तालियों की गूंज देर तक हवा में तैरती रही। यह सिर्फ एक प्रस्तुति नहीं थी, बल्कि भारत की सांस्कृतिक विरासत का गौरवपूर्ण प्रदर्शन था। खैरागढ़ से उठी यह कला की आवाज अब अंतरराष्ट्रीय मंच पर गूंज चुकी थी और यह साबित कर चुकी थी कि जुनून और समर्पण से कोई भी सपना सीमाओं में नहीं बंधता।
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