- Post by Admin on Sunday, Apr 19, 2026
- 459 Viewed
![]()
अप्रैल ही तो है…पर लगता है जैसे सूरज ने जून से उधार ले ली हो आग,धरती तप रही है यूँ… जैसे किसी ने रख दी हो उस पर नाराज़गी की राख।
कभी जो पेड़ थे छाँव के देवता,आज वही कटकर खामोश हैं…और हम पूछते हैं “इतनी गर्मी क्यों है?
”जवाब हवा देती है“क्योंकि तुमने मुझे सांस लेने नहीं दी…” नदियाँ, जो गुनगुनाती थीं लोरी,आज प्यास से सूखी पड़ी हैं…
आसमान भी जैसे थककर कह रहा हो “मैं बरसना चाहता हूँ,पर तुम्हारी ही बनाई दीवारों से घिरा हूँ…
” ये 45 डिग्री का तापमान,सिर्फ मौसम की खबर नहीं…ये इंसान की आदतों का आईना है,जो हर साल थोड़ा और लाल हो जाता है।
हमने जंगलों को काटकर कंक्रीट के जंगल बो दिए,और फिर AC में बैठकर बोले “बहुत गर्मी है…”ये व्यंग्य नहीं,हमारी ही बनाई हुई कहानी है।
अगर यही चलता रहा,तो आने वाला कल किताबों में नहीं,खबरों में लिखा जाएगा…जहाँ बच्चे पूछेंगे “माँ, पेड़ क्या होते हैं?”और माँ चुप हो जाएगी…
पर अभी भी वक्त है हर हाथ एक पेड़ लगाए,हर दिल थोड़ा सा ठंडा हो जाए,पानी को पूजा की तरह संभाले,और प्रकृति को फिर से माँ माने…
क्योंकि गर्मी सिर्फ मौसम नहीं,एक चेतावनी है…कि अगर अब भी न बदले हम,तो सूरज नहीं—हम खुद ही जल जाएंगे… रजनी जोशी
अन्य समाचार
विश्व पर्यावरण दिवस पर राज्य स्तरीय सम्मान समारोह में साहित्य और संस्कृति के साधकों का सम्मान
वरिष्ठ साहित्यकार एवं संस्कृतिकर्मी डॉ. दीनदयाल साहू तथा डॉ. डी.पी. देशमुख को उनके उल्लेखनीय योगदान के लिए सम्मानित किया गया।
Read More...
वो सुकून भरी रोशनियाँ अब कहाँ हैं…
क्योंकि सच तो यही है इस चमकती दुनिया में सब कुछ रोशन होकर भी बहुत कुछ अंधेरे में खो गया है…।
Read More...
जब संवेदनाएं बनीं उपन्यास...‘पीरा’ के जरिए जनभावनाओं को आवाज़ देने वाला साहित्यिक सफर...साहित्य साधना से समाज को दिशा दे रहे हैं डॉ. दीनदयाल साहू
रायपुर के न्यू सर्किट हाउस सभागार में छत्तीसगढ़ राजभाषा आयोग द्वारा आयोजित एक दिवसीय साहित्यिक समारोह में डॉ. दीनदयाल साहू की बहुचर्चित छत्तीसगढ़ी उपन्यास ‘पीरा’ का भव्य विमोचन हुआ
Read More...
जब किसी बच्चे ने पहली बार “मां” कहा…
रजनी राठी का मानना है कि हर बच्चे के भीतर एक अनोखी प्रतिभा छिपी होती है, बस उसे सही दिशा और संवेदनशील सहयोग की जरूरत होती है। वे आधुनिक तकनीकों और विशेष प्रशिक्षण के माध्यम से बच्चों के संचार कौशल को विकसित करने में लगातार कार्य कर रही हैं। उनका यह समर्पण केवल पेशा नहीं, बल्कि समाज के प्रति सेवा का जीवंत उदाहरण बन चुका है।
Read More...
संस्मरण....मिट्टी का घर, खपरैल की छत तले बसी ठंडी दुनिया
आज जब कंक्रीट के जंगलों में हम एसी और कूलर के बीच भी चैन नहीं ढूंढ पाते, तब मिट्टी-खपरैल के वे घर याद आते हैं। वे घर, जो सिर्फ रहने की जगह नहीं, बल्कि प्रकृति के साथ तालमेल का सबसे खूबसूरत उदाहरण थे। शायद यही वजह है कि उन घरों की यादें आज भी दिल के किसी कोने में ठंडी छांव बनकर जिंदा हैं जहां लौटने का मन बार-बार करता है।
Read More...
मैं मज़दूर मुझे देवों की बस्ती से क्या
रामधारी सिंह दिनकर साहित्य के वह सशक्त हस्ताक्षर हैं जिनकी कलम में दिनकर यानी सूर्य के समान चमक थी। उनकी कविताएं सिर्फ़ उनके समय का सूरज नहीं हैं बल्कि उसकी रौशनी से पीढ़ियां प्रकाशमान होती हैं।
Read More...
समसामयिक विषय...सूखते दरख़्त, बुझती नदियाँ: इंसान कब समझेगा अपनी भूल...जलवायु परिवर्तन और प्राकृतिक असंतुलन की भयावह तस्वीर
आज पूरा देश प्रचंड गर्मी की चपेट में है, लेकिन यह संकट अचानक नहीं आया। एक ओर हम “पेड़ लगाओ” का नारा लगाते हैं, वहीं दूसरी ओर बड़े पैमाने पर पेड़ों की कटाई जारी है।
Read More...
जब खैरागढ़ से उठी कला की गूंज, और थाईलैंड तक पहुँची भारत की पहचान
मो. आसिफ हुसैन, राजेंद्र कुमार, तोषिता असाटी, मधुश्मिता पॉल और एक्कलक नू नगियोन ने जैसे ही अपनी प्रस्तुतियाँ शुरू कीं, हर नजर उन पर टिक गई। उनके हर भाव, हर सुर और हर कदम में भारतीय संस्कृति की गहराई झलक रही थी। ऐसा लग रहा था जैसे भारत की आत्मा स्वयं उस मंच पर जीवंत हो उठी हो।
Read More...
डॉ. शुभा मिश्रा और गजेंद्र कुमार साहू सरस्वती साहित्य नव लेखक सम्मान से सम्मानित
विमतारा सभागार रायपुर में सरस्वती बुक्स व श्रीसाईनाथ फाउंडेशन के द्वारा आयोजित सरस्वती साहित्य सम्मान समारोह में डॉ. शुभा मिश्रा और गजेंद्र कुमार साहू को सरस्वती साहित्य नव लेखक सम्मान से सम्मानित किया गया
Read More...