अप्रैल ही तो है…पर लगता है जैसे सूरज ने जून से उधार ले ली हो आग,धरती तप रही है यूँ… जैसे किसी ने रख दी हो उस पर नाराज़गी की राख।

कभी जो पेड़ थे छाँव के देवता,आज वही कटकर खामोश हैं…और हम पूछते हैं “इतनी गर्मी क्यों है?

”जवाब हवा देती है“क्योंकि तुमने मुझे सांस लेने नहीं दी…” नदियाँ, जो गुनगुनाती थीं लोरी,आज प्यास से सूखी पड़ी हैं…

आसमान भी जैसे थककर कह रहा हो “मैं बरसना चाहता हूँ,पर तुम्हारी ही बनाई दीवारों से घिरा हूँ…

” ये 45 डिग्री का तापमान,सिर्फ मौसम की खबर नहीं…ये इंसान की आदतों का आईना है,जो हर साल थोड़ा और लाल हो जाता है।

हमने जंगलों को काटकर कंक्रीट के जंगल बो दिए,और फिर AC में बैठकर बोले “बहुत गर्मी है…”ये व्यंग्य नहीं,हमारी ही बनाई हुई कहानी है।

अगर यही चलता रहा,तो आने वाला कल किताबों में नहीं,खबरों में लिखा जाएगा…जहाँ बच्चे पूछेंगे “माँ, पेड़ क्या होते हैं?”और माँ चुप हो जाएगी…

पर अभी भी वक्त है हर हाथ एक पेड़ लगाए,हर दिल थोड़ा सा ठंडा हो जाए,पानी को पूजा की तरह संभाले,और प्रकृति को फिर से माँ माने…

क्योंकि गर्मी सिर्फ मौसम नहीं,एक चेतावनी है…कि अगर अब भी न बदले हम,तो सूरज नहीं—हम खुद ही जल जाएंगे… रजनी जोशी

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