मैं मज़दूर मुझे देवों की बस्ती से क्या

अगणित बार धरा पर मैंने स्वर्ग बनाए।

अंबर में जितने तारे,

उतने वर्षों से मेरे पुरखों ने धरती का रूप सँवारा।

 

धरती को सुंदरतम

करने की ममता में

बिता चुका है कई

पीढ़ियाँ, वंश हमारा।

 

और आगे आने

वाली सदियों में

मेरे वंशज

धरती का उद्धार करेंगे।

इस प्यासी धरती के

हित में ही लाया था

 

हिमगिरी चीर सुखद

गंगा की निर्मल धारा।

मैंने रेगिस्तानों की रेती

धो-धोकर वन्ध्या धरती

पर भी स्वर्णिम पुष्प खिलाए।

मैं मज़दूर मुझे देवों की बस्ती से क्या?

 

रामधारी सिंह दिनकर साहित्य के वह सशक्त हस्ताक्षर हैं जिनकी कलम में दिनकर यानी सूर्य के समान चमक थी। उनकी कविताएं सिर्फ़ उनके समय का सूरज नहीं हैं बल्कि उसकी रौशनी से पीढ़ियां प्रकाशमान होती हैं। हिन्दी के सुविख्यात कवि रामधारी सिंह दिनकर का जन्म 23 सितंबर 1908 ई. में सिमरिया, मुंगेर (बिहार) में एक सामान्य किसान 'रवि सिंह' तथा उनकी पत्नी 'मनरूप देवी' के पुत्र के रूप में हुआ था। रामधारी सिंह दिनकर एक ओजस्वी राष्ट्रभक्ति से ओतप्रोत कवि के रूप में जाने जाते थे। उनकी कविताओं में छायावादी युग का प्रभाव होने के कारण श्रृंगार के भी प्रमाण मिलते हैं।

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