- Post by Admin on Wednesday, Apr 29, 2026
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कमलेश यादव: अप्रैल की दोपहरी अब सिर्फ गर्म नहीं रही, यह झुलसाने लगी है। सूरज जैसे आग उगल रहा है, जमीन तपकर अंगार बन चुकी है, और इंसान छांव की तलाश में भटक रहा है। कभी जिस धरती पर पेड़ों की हरियाली सुकून देती थी, आज वही धरती प्यास से कराह रही है। यह सिर्फ मौसम का बदलाव नहीं, बल्कि हमारी अपनी गलतियों का आईना है जहां विकास की अंधी दौड़ में हमने प्रकृति की सांसें छीन ली हैं।
आज पूरा देश प्रचंड गर्मी की चपेट में है, लेकिन यह संकट अचानक नहीं आया। एक ओर हम “पेड़ लगाओ” का नारा लगाते हैं, वहीं दूसरी ओर बड़े पैमाने पर पेड़ों की कटाई जारी है। शहरों के विस्तार, सड़कों के चौड़ीकरण और उद्योगों के नाम पर हरियाली को बेरहमी से खत्म किया जा रहा है। नतीजा यह है कि जो पेड़ हमें ठंडक और जीवन देते थे, वही अब यादों में सिमटते जा रहे हैं।
पानी की स्थिति और भी चिंताजनक है। एक तरफ “पानी बचाओ” अभियान चलाए जाते हैं, तो दूसरी ओर नदियों, तालाबों और भूमिगत जल स्रोतों का लगातार दोहन हो रहा है। बोरवेल गहराते जा रहे हैं, लेकिन जल स्तर नीचे खिसकता जा रहा है। छत्तीसगढ़ जैसे जल संपन्न राज्य में भी कई जगहों पर पानी के लिए हाहाकार मच रहा है, जो आने वाले गंभीर संकट की चेतावनी है।
छत्तीसगढ़ के पर्यावरण प्रेमी वीरेंद्र सिंह इस स्थिति को लेकर कहते हैं, “हम प्रकृति को संसाधन नहीं, सिर्फ उपयोग की वस्तु समझ बैठे हैं। जब तक हम प्रकृति के साथ संतुलन बनाकर नहीं चलेंगे, तब तक यह संकट और गहराता जाएगा। पेड़ सिर्फ ऑक्सीजन नहीं देते, वे तापमान को नियंत्रित करते हैं, जल चक्र को संतुलित रखते हैं—लेकिन हमने इनकी अहमियत को नजरअंदाज कर दिया है।” उनके अनुसार, यह समय केवल चिंता करने का नहीं, बल्कि ठोस कदम उठाने का है।
इस संकट के प्रमुख कारणों में अंधाधुंध शहरीकरण, जंगलों की कटाई, जल स्रोतों का अति-दोहन और जल संरक्षण की अनदेखी शामिल हैं। इसके साथ ही बढ़ता प्रदूषण और जलवायु परिवर्तन ने स्थिति को और भयावह बना दिया है। अगर यही हाल रहा, तो आने वाले वर्षों में गर्मी सिर्फ असहनीय नहीं, बल्कि जीवन के लिए खतरा बन सकती है।
अब सवाल यह है कि क्या हम सिर्फ नारे लगाकर अपनी जिम्मेदारी पूरी समझ लेंगे, या सच में बदलाव लाएंगे? जरूरत है कि प्रशासन सख्त नियम लागू करे, जल संरक्षण को प्राथमिकता दे और वृक्षारोपण को केवल अभियान नहीं, जन आंदोलन बनाए। वहीं आम लोगों को भी अपनी आदतों में बदलाव लाना होगा—पानी की हर बूंद बचानी होगी और हर संभव जगह पेड़ लगाने होंगे। क्योंकि अगर अब भी हम नहीं चेते, तो आने वाली पीढ़ियां हमें माफ नहीं करेंगी।
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