- Post by Admin on Monday, May 04, 2026
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कमलेश यादव : दोपहर की तेज धूप आसमान से जैसे आग बरसा रही है। सड़कें तप रही हैं, हवा भी अंगारों जैसी चुभ रही है। लेकिन जैसे ही कदम उस मिट्टी-खपरैल के घर की देहरी पर पड़ते हैं, एक अलग ही दुनिया सामने खुल जाती है। भीतर घुसते ही ठंडक का ऐसा अहसास होता है मानो किसी ने तपते शरीर पर शीतल जल की फुहार डाल दी हो। दीवारों से आती मिट्टी की सौंधी खुशबू मन को सुकून देती है, और खपरैल की छत के नीचे पसरी शांति जैसे सारी थकान को अपने साथ बहा ले जाती है।
उस घर का आंगन, जहां सुबह-सुबह पानी का छिड़काव किया जाता था, अब भी ठंडक समेटे हुए है। कोने में रखा मटका, जिसके पास जाते ही ठंडे पानी की मीठी तासीर गले से उतरकर आत्मा तक पहुंच जाती है। कहीं दादी की खटिया बिछी है, तो कहीं बच्चों की खिलखिलाहट की गूंज।
खपरैल की छत से छनकर आती हल्की रोशनी जैसे हर कोने को एक कहानी में बदल देती है एक ऐसी कहानी, जो आज भी दिल में बसी है। गर्मी के उन दिनों में, जब बाहर लू के थपेड़े चेहरे को झुलसा देते थे, यही घर सबसे सुरक्षित पनाहगाह बन जाता था। मोटी मिट्टी की दीवारें बाहर की तपिश को अंदर आने ही नहीं देती थीं।
हवा खिड़कियों से होकर जब अंदर प्रवेश करती, तो वह ठंडी होकर गालों को छूती जैसे कोई अपना स्नेह से सहला रहा हो। यहां पंखों या एसी की जरूरत नहीं थी, क्योंकि प्रकृति खुद इस घर की रखवाली करती थी। शाम होते ही जब सूरज ढलता, तो खपरैल की छत पर बैठकर आसमान के रंग बदलते देखना एक अलग ही आनंद देता था।
पक्षियों का लौटना, दूर कहीं से आती गायों की घंटियों की आवाज, और चूल्हे से उठती रोटी की महक सब मिलकर एक ऐसा माहौल बनाते थे, जिसे शब्दों में बांधना मुश्किल है। यह सिर्फ एक घर नहीं था, यह जीवन का वह हिस्सा था, जहां हर पल में अपनापन और सुकून बसा हुआ था। आज जब कंक्रीट के जंगलों में हम एसी और कूलर के बीच भी चैन नहीं ढूंढ पाते, तब मिट्टी-खपरैल के वे घर याद आते हैं।
वे घर, जो सिर्फ रहने की जगह नहीं, बल्कि प्रकृति के साथ तालमेल का सबसे खूबसूरत उदाहरण थे। शायद यही वजह है कि उन घरों की यादें आज भी दिल के किसी कोने में ठंडी छांव बनकर जिंदा हैं जहां लौटने का मन बार-बार करता है।
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