- Post by Admin on Tuesday, Sep 22, 2026
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बलरामपुर : छत्तीसगढ़ के बलरामपुर जिले से शिक्षकों के समर्पण की एक प्रेरणादायक तस्वीर सामने आई है। वाड्रफनगर ब्लॉक के धौरपुर गांव में तैनात दो शिक्षिकाएं बारिश के मौसम में हर दिन करीब 3 किलोमीटर पैदल चलकर और फिर उफनती नदी पार करके स्कूल पहुंचती हैं, ताकि गांव के बच्चों की पढ़ाई एक दिन के लिए भी न रुके।
शिक्षिका संध्या हलदर अपनी 9 महीने की बेटी को गोद में लेकर मोरन-इरिआ नदियों के संगम को पार करती हैं। जलस्तर बढ़ने के बावजूद मां का हौसला हर बार उस चुनौती से बड़ा साबित होता है। बच्ची को सीने से लगाए, कदम दर कदम सतर्कता के साथ वे नदी के उस पार पहुंचती हैं सिर्फ इसलिए कि दूसरी तरफ स्कूल में उनका इंतजार कर रहे बच्चों के चेहरे पर मुस्कान बनी रहे।
इसी स्कूल की दूसरी शिक्षिका कर्मिला टोप्पो 2014 से इस रास्ते पर चल रही हैं। सालों का अनुभव भी उन्हें नदी पार करने से पहले होने वाली घबराहट से मुक्त नहीं कर पाया, लेकिन हर बारिश में वे फिर से वही साहस जुटाती हैं। दोनों शिक्षिकाओं के लिए यह सफर किसी ड्यूटी से कहीं बढ़कर एक जिम्मेदारी और जुनून है।
संध्या बताती हैं कि जिस दिन नदी पार करना मुमकिन नहीं होता, उन्हें बच्चों की पढ़ाई छूटने का मलाल सताता है। और जिस दिन वे स्कूल पहुंच पाती हैं, बच्चों की खुशी ही उनकी सबसे बड़ी ताकत बन जाती है यही जज्बा उन्हें हर बारिश में फिर से उसी नदी के सामने खड़ा कर देता है।
बलरामपुर कलेक्टर चंदन संजय त्रिपाठी ने जब यह खबर सुनी, तो उन्होंने खुले दिल से शिक्षिकाओं की सराहना की। उन्होंने कहा कि अपने नन्हे बच्चे को साथ लेकर नदी पार करने वाली शिक्षिका जैसी लगन बहुत कम देखने को मिलती है, और ऐसे शिक्षकों का सम्मान करना पूरे जिले के लिए गर्व की बात है। धौरपुर की यह कहानी बताती है कि सच्ची शिक्षा-सेवा किसी सुविधा की मोहताज नहीं होती।
जहां संसाधन कम हों, वहां भी इरादा मजबूत हो तो रास्ता खुद बन जाता है। संध्या और कर्मिला जैसी शिक्षिकाएं इस बात की जीती-जागती मिसाल हैं कि जज्बा हो तो नदी की लहरें भी कदम नहीं रोक पातीं।
आज जब संध्या की गोद में पली उनकी बेटी बड़ी होगी, तो उसे अपनी मां की यह कहानी सिर्फ एक याद नहीं, बल्कि जिंदगी का सबसे बड़ा सबक सिखाएगी कि हौसला हो तो हर नदी पार की जा सकती है, और हर मंजिल तक पहुंचा जा सकता है।
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