गोपी साहू : विज्ञान की दुनिया में एक ऐसी खोज हुई है जिसने सबको हैरान कर दिया है. अमेरिका के वैज्ञानिकों ने एक ऐसा Brain-Computer Interface (BCI) विकसित किया है जो हमारी सोच को सीधे शब्दों और आवाज में बदल सकता है. यानी भविष्य में आपको बोलने या टाइप करने की जरूरत नहीं होगी- बस सोचना होगा और आपकी बात स्क्रीन या आवाज़ के रूप में सामने होगी. यह तकनीक खासतौर पर पैरालिसिस और बोलने में असमर्थ लोगों के लिए किसी चमत्कार से कम नहीं है. तो आइए सवाल-जवाब के ज़रिए जानते हैं कि यह टेक्नोलॉजी आखिर काम कैसे करती है और हमारे लिए कितनी कारगर साबित हो सकती है.

दिमाग पढ़ने वाली यह तकनीक है क्या? इसे Brain-Computer Interface (BCI) कहते हैं. इसमें एक बेहद छोटी ब्लैक स्क्वायर चिप इंसान के दिमाग में लगाई जाती है. यह चिप दिमाग के उस हिस्से से जुड़ती है जो मूवमेंट और बोलने की प्रक्रिया को कंट्रोल करता है. जब इंसान कुछ सोचता है, तो दिमाग में इलेक्ट्रिकल पैटर्न बनते हैं. यह चिप उन्हीं पैटर्न को पढ़कर शब्दों और ध्वनियों में बदल देती है.

इस तकनीक का इस्तेमाल किसने और कहां किया? शोध अमेरिका के कई बड़े संस्थानों, खासकर Stanford University के वैज्ञानिकों ने किया. इसे अब तक चार ऐसे वॉलंटियर्स पर टेस्ट किया गया है जो गंभीर पैरालिसिस से जूझ रहे हैं. क्या यह वाकई काम करती है? हां, और चौंकाने वाली बात यह है कि इसने लगभग 74% तक सटीकता के साथ इंसानों की सोच को आवाज और टेक्स्ट में बदला. यह तकनीक करीब 1,25,000 शब्दों तक पहचान सकती है, जो किसी भी डिक्शनरी से कम नहीं है.

यह पुरानी BCI तकनीक से कैसे अलग है? पहले की तकनीकें सिर्फ तभी काम करती थीं जब कोई पैरालाइज्ड व्यक्ति बोलने या लिखने की कोशिश करता था. लेकिन नई तकनीक में आपको सिर्फ सोचना होता है. यह सीधे आपके "Inner Speech" (भीतरी विचार) को पकड़ लेती है. इसमें मशीन लर्निंग की क्या भूमिका है? इस तकनीक को Machine Learning से ट्रेन किया गया है. यानी जैसे-जैसे आप सोचते हैं, सिस्टम दिमाग के पैटर्न को समझता है और उन्हें फोनीम्स (भाषा की छोटी इकाइयाँ) में बदलता है. इन्हीं फोनीम्स से आगे जाकर वाक्य बनते हैं.

क्या यह हमारी प्राइवेट सोच भी पढ़ लेगी? यह एक बड़ा सवाल है. वैज्ञानिकों का कहना है कि अगर सुरक्षा न हो तो यह इंसान के अंदरूनी विचारों को भी पकड़ सकती है. लेकिन इसके लिए उन्होंने एक तरह का पासवर्ड सिस्टम बनाया है. यानी आप जब चाहें डिकोडिंग शुरू या बंद कर सकते हैं. अभी के ट्रायल में यह सिस्टम 98% सटीक निकला.

भविष्य में इसका क्या असर होगा? अगर यह तकनीक पूरी तरह विकसित हो गई तो: पैरालाइज्ड लोग आसानी से बातचीत कर पाएंगे. बोलने या टाइप करने की ज़रूरत ही नहीं रहेगी. मोबाइल और कंप्यूटर सीधे आपके दिमाग से ऑपरेट हो सकेंगे. यहां तक कि रोबोट और AI सिस्टम को भी आप सिर्फ सोचकर कंट्रोल कर पाएंगे.

क्या यह अभी मार्केट में उपलब्ध है? नहीं, यह फिलहाल सिर्फ रिसर्च और ट्रायल फेज में है. वैज्ञानिक मानते हैं कि आने वाले कुछ सालों में यह तकनीक और भी तेज़, सटीक और सुरक्षित बन जाएगी. Stanford University के न्यूरोसाइंटिस्ट Frank Willett का कहना है, "यह तकनीक लोगों के लिए बातचीत को उतना ही सहज और प्राकृतिक बना सकती है जितनी आम बोलचाल की भाषा होती है." दिमाग पढ़ने वाली यह नई चिप टेक्नोलॉजी इंसान और मशीन के रिश्ते को पूरी तरह बदल सकती है.

अभी यह शुरुआती दौर में है, लेकिन जिस तरह से Artificial Intelligence और Machine Learning इसमें जुड़ रही है, वह दिन दूर नहीं जब हम बिना बोले, बिना लिखे सिर्फ सोचकर बातचीत कर पाएंगे.

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