समीक्षा विशेष... अभिषेक श्रीवास्तव (अंतागढ); उपन्यास गांव खेड़ा मौहा भाठा दो बैठक में पूरा पढ़ लिया। बहुत ही रुचिकर लगा। अंत तक जिज्ञासा बनी रही कि अंततः क्या होगा। सामान्यतः किसी भी कहानी उपन्यास या फिल्म के अंत में एक सुखांत दिखाया जाता है कि अचानक किसी घटनाक्रम में सभी चीजें नायक या नायिका के पक्ष में होती चली जाती हैं और अंततः उसकी विजय होती है किंतु मोहा भाठा में ऐसा नहीं हुआ, जो कि जीवन की वास्तविकता को बताता है।

वास्तविक जीवन में घटनाएं फिल्म की तरह नहीं चलती हैं। कहते हैं, सत्य परेशान हो सकता है लेकिन पराजित नहीं, किंतु वास्तविक जीवन में नौकरशाही से सत्य इतना परेशान हो जाता है कि हर किसी के लिए लड़ना और सत्य का दामन थामे रखना आसान नहीं होता।

कई बार युवा अपने अपने जीवन की शुरुआत बहुत ईमानदारी से करते हैं किंतु जब नौकरशाही से होने वाली परेशानी को देखते हैं तो धीरे-धीरे उसके साथ एडजस्ट होकर सिस्टम का हिस्सा बन जाते हैं।

उपन्यास में अंत तक यह जिज्ञासा बनी रही कि क्या जयमती आखिर तक सत्य के लिए लड़ेगी या परिस्थितियों से समझौता कर सिस्टम का हिस्सा बन जाएगी। बहुत ही सुंदर उपन्यास

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