सत्यदर्शन लाइव डेस्क : 18 दिसम्बर संत शिरोमणि बाबा गुरु घासीदास जी की 269वीं जयंती। जब दुनिया शोर, भेद और अहंकार से घिरी हो, तब उनकी आवाज़ आज भी भीतर से पुकारती है, “मनखे-मनखे एक समान।” यह केवल शब्द नहीं, बल्कि मानवता का शाश्वत सत्य है। बाबा जी ने उस दौर में सत्य का दीप जलाया, जब अंधकार सबसे गहरा था, और आज भी वही दीप हमारे भटके हुए समाज को सही राह दिखा रहा है।

बाबा गुरु घासीदास जी ने जंगलों, खेतों और साधारण जीवन के बीच उन्होंने सत्य, अहिंसा और समानता को व्यवहार में उतारा। उनके लिए धर्म का अर्थ पूजा नहीं, बल्कि इंसान को इंसान समझना था। उन्होंने बताया कि ईश्वर मंदिरों में नहीं, बल्कि हर जीव के भीतर बसता है बस देखने की दृष्टि चाहिए।

आज जब समाज जाति, धर्म और वर्ग की दीवारों में बंटता जा रहा है, बाबा जी की शिक्षाएँ और भी प्रासंगिक हो जाती हैं। उन्होंने कहा था “सत्य के मार्ग पर चलो, चाहे राह कठिन क्यों न हो।” यह संदेश आज के युवाओं, नेताओं और आम नागरिकों के लिए आईना है। अगर हम सच बोलना, न्याय करना और प्रेम बाँटना सीख लें, तो समाज अपने आप बदल सकता है।

बाबा गुरु घासीदास जी केवल सतनाम पंथ के प्रवर्तक नहीं थे, वे एक सामाजिक क्रांति थे। उन्होंने दबे-कुचले लोगों को आत्मसम्मान दिया, उन्हें अपनी पहचान से परिचित कराया। उन्होंने सिखाया कि गुलामी बाहर की नहीं, सोच की होती है और जब सोच आज़ाद होती है, तो जीवन भी उज्ज्वल हो जाता है। यही कारण है कि उनकी वाणी आज भी लाखों दिलों में आत्मविश्वास भर देती है।

बाबा गुरु घासीदास जी की शिक्षाएँ हमें याद दिलाती हैं कि परिवर्तन की शुरुआत बाहर से नहीं, भीतर से होती है। अगर हम उनके संदेश को जीवन में उतार लें सत्य, समानता और करुणा तो यही उनकी सच्ची भक्ति होगी। बाबा जी का जीवन हमें सिखाता है कि एक सच्चा विचार पूरी पीढ़ी का भविष्य बदल सकता है।

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