- Post by Admin on Thursday, Dec 18, 2025
- 501 Viewed
![]()
सत्यदर्शन लाइव डेस्क : 18 दिसम्बर संत शिरोमणि बाबा गुरु घासीदास जी की 269वीं जयंती। जब दुनिया शोर, भेद और अहंकार से घिरी हो, तब उनकी आवाज़ आज भी भीतर से पुकारती है, “मनखे-मनखे एक समान।” यह केवल शब्द नहीं, बल्कि मानवता का शाश्वत सत्य है। बाबा जी ने उस दौर में सत्य का दीप जलाया, जब अंधकार सबसे गहरा था, और आज भी वही दीप हमारे भटके हुए समाज को सही राह दिखा रहा है।
बाबा गुरु घासीदास जी ने जंगलों, खेतों और साधारण जीवन के बीच उन्होंने सत्य, अहिंसा और समानता को व्यवहार में उतारा। उनके लिए धर्म का अर्थ पूजा नहीं, बल्कि इंसान को इंसान समझना था। उन्होंने बताया कि ईश्वर मंदिरों में नहीं, बल्कि हर जीव के भीतर बसता है बस देखने की दृष्टि चाहिए।
आज जब समाज जाति, धर्म और वर्ग की दीवारों में बंटता जा रहा है, बाबा जी की शिक्षाएँ और भी प्रासंगिक हो जाती हैं। उन्होंने कहा था “सत्य के मार्ग पर चलो, चाहे राह कठिन क्यों न हो।” यह संदेश आज के युवाओं, नेताओं और आम नागरिकों के लिए आईना है। अगर हम सच बोलना, न्याय करना और प्रेम बाँटना सीख लें, तो समाज अपने आप बदल सकता है।
बाबा गुरु घासीदास जी केवल सतनाम पंथ के प्रवर्तक नहीं थे, वे एक सामाजिक क्रांति थे। उन्होंने दबे-कुचले लोगों को आत्मसम्मान दिया, उन्हें अपनी पहचान से परिचित कराया। उन्होंने सिखाया कि गुलामी बाहर की नहीं, सोच की होती है और जब सोच आज़ाद होती है, तो जीवन भी उज्ज्वल हो जाता है। यही कारण है कि उनकी वाणी आज भी लाखों दिलों में आत्मविश्वास भर देती है।
बाबा गुरु घासीदास जी की शिक्षाएँ हमें याद दिलाती हैं कि परिवर्तन की शुरुआत बाहर से नहीं, भीतर से होती है। अगर हम उनके संदेश को जीवन में उतार लें सत्य, समानता और करुणा तो यही उनकी सच्ची भक्ति होगी। बाबा जी का जीवन हमें सिखाता है कि एक सच्चा विचार पूरी पीढ़ी का भविष्य बदल सकता है।
अन्य समाचार
स्व. कुलदीप सिंह साहू स्मृति सम्मान समारोह साहू मित्र सभागार भिलाई में
यह कार्यक्रम लोक कला एवं साहित्य संस्था सिरजन तथा साहित्य प्रकोष्ठ साहू मित्र सभा के संयुक्त तत्वावधान में साहू मित्र सभा सभागार में शुक्रवार 13 तारीख को संध्या 4 बजे आयोजित की जाएगी।
Read More...
रंग-बिरंगी, भावपूर्ण और मन को छू लेने वाली कविताओं का सुंदर संग्रह ...चम्पेश्वर गिरि गोस्वामी की बहुप्रतीक्षित पुस्तक का भव्य विमोचन
जब एक रचनाकार अपने अनुभवों, भावनाओं और सपनों को कागज़ पर उतारता है, तो वह केवल पुस्तक नहीं, बल्कि पाठकों के लिए एक प्रेरक यात्रा रचता है
Read More...
दिमाग पढ़ने वाली चिप! वैज्ञानिकों ने बनाई सोच को आवाज में बदलने वाली तकनीक, बिना बोले भी कह पाएंगे अपनी बात
दिमाग पढ़ने वाली यह नई चिप टेक्नोलॉजी इंसान और मशीन के रिश्ते को पूरी तरह बदल सकती है. अभी यह शुरुआती दौर में है, लेकिन जिस तरह से Artificial Intelligence और Machine Learning इसमें जुड़ रही है, वह दिन दूर नहीं जब हम बिना बोले, बिना लिखे सिर्फ सोचकर बातचीत कर पाएंगे.
Read More...
अंतरराष्ट्रीय साहित्य महोत्सव उन्मेष 2025 : वरिष्ठ साहित्यकार दीनदयाल साहू को 24 भाषाओं और 70 आदिवासी समुदायों के लेखकों के बीच छत्तीसगढ़ी कहानी वाचन के लिए आमंत्रित किया गया
देश–विदेश से आए कथाकारों, उपन्यासकारों और शोधार्थियों के बीच इस तीन दिवसीय महोत्सव में छत्तीसगढ़ का प्रतिनिधित्व करने का सौभाग्य मिला भिलाई नगर निवासी वरिष्ठ साहित्यकार और संपादक दीनदयाल साहू को
Read More...
सत्यदर्शन साहित्य : भरी-पूरी हों सभी बोलियां,यही कामना हिंदी है...गहरी हो पहचान आपसी,यही साधना हिंदी है...गिरिजाकुमार माथुर
गिरिजाकुमार माथुर का जन्म 22 अगस्त 1919 को अशोकनगर (मध्यप्रदेश) में हुआ था। वे आधुनिक हिंदी कविता के महत्वपूर्ण हस्ताक्षर रहे
Read More...
सत्यदर्शन साहित्य... प्रिय गीत तुम्हें मैं गाऊंगा : छत्तीसगढ़ की आत्मा से जुड़ा गीत-संग्रह
छत्तीसगढ़ के सुप्रसिद्ध गीतकार चम्पेश्वर गोस्वामी द्वारा रचित गीत-संग्रह “प्रिय गीत तुम्हें मैं गाऊंगा” साहित्य और संगीत की दुनिया में एक नई पहचान बना रहा है।
Read More...
जो तुम आ जाते एक बार....महादेवी वर्मा
महादेवी वर्मा हिंदी साहित्य की प्रसिद्ध कवयित्री, लेखिका और समाजसेविका थीं, जिन्हें आधुनिक मीरा भी कहा जाता है। वे छायावादी काव्य धारा की चार प्रमुख स्तंभों में से एक थीं। उनकी कविताओं में गहन करुणा, संवेदनशीलता और आध्यात्मिक प्रेम की झलक मिलती है।
Read More...
लोक संस्कृति के अमर राग: 69 वर्षीय दुर्वासा कुमार टण्डन को मानद डॉक्टरेट उपाधि
69 वर्षीय प्रसिद्ध लोक कलाकार दुर्वासा कुमार टण्डन ने यह साबित कर दिया कि सच्ची लगन, निरंतर साधना और संस्कृति के प्रति अटूट प्रेम उम्र की सीमाओं को लांघ सकता है।
Read More...
आत्मचिंतन : धरती पर जब पहली बार मानव ने आँख खोली थी, तब उसके हाथ में न मोबाइल था, न मशीन! बस एक बीज था और आकाश में टकटकी लगाए विश्वास की दृष्टि
वे वृक्षों को अपना कुल-गोत्र कहते हैं, हर पशु पक्षी में अपना पूर्वज ढूँढ़ते हैं, और हर नदी में माँ का आशीष। पर विडंबना यह कि हम, स्वयं को 'सभ्य' कहने वाले, उसी धरती और जंगल को बेचकर अपनी तरक्की के महल खड़े कर रहे हैं।
Read More...
साहित्य और संवेदना का संगम : छत्तीसगढ़ी व्यंग्य साहित्य को समर्पित भव्य आयोजन
छत्तीसगढ़ी व्यंग्य संग्रह ‘कलंकपुर के कलंक’ का विमोचन, पर्यावरण संरक्षण के तहत वृक्षारोपण और सांस्कृतिक सौंध से सुवासित काव्य गोष्ठी सम्पन्न हुई।
Read More...