कमलेश यादव : राजनांदगांव से लगभग 8 किलोमीटर दूर स्थित ग्राम खैरा (पोस्ट–कन्हारपुरी) आज केवल एक गांव नहीं, बल्कि सामूहिक जिम्मेदारी, सेवा और एकता की जीवंत मिसाल बन चुका है। यहां न कोई सफाई कर्मचारी है, न किसी को वेतन मिलता है, फिर भी पिछले 13 वर्षों से गांव की महिलाएं हर सुबह अपने गांव की गलियों और सड़कों को अपने घर की तरह संवारती हैं। यह कहानी बताती है कि जब सेवा भावना दिल से जुड़ जाती है, तब बदलाव के लिए सरकारी व्यवस्था नहीं, बल्कि जागरूक नागरिक ही सबसे बड़ी ताकत बन जाते हैं।

गौरतलब है कि, भारती ग्राम संगठन के तत्वावधान में संचालित जागृति स्वयं सहायता समूह की महिलाओं ने वर्ष 2013 से गांव की नियमित साफ-सफाई का संकल्प लिया। ग्राम पंचायत में संचालित 11 महिला स्वयं सहायता समूह बारी-बारी से प्रत्येक माह सफाई की जिम्मेदारी निभाते हैं। बिना किसी मानदेय या आर्थिक लाभ के यह सेवा केवल इसलिए की जाती है क्योंकि इन महिलाओं का मानना है कि "गांव भी हमारा घर है, और इसकी स्वच्छता बनाए रखना हम सभी का सामूहिक कर्तव्य है।" यह सोच आज पूरे समाज के लिए प्रेरणा का संदेश है।

इन महिलाओं की सेवा केवल स्वच्छता तक सीमित नहीं है। गांव में किसी परिवार पर दुःख का पहाड़ टूटने पर, विशेषकर किसी के निधन की स्थिति में, सभी महिलाएं सामूहिक रूप से एक-एक किलो चावल और 100 रुपये का अंशदान देकर सहयोग करती हैं। आज जब समाज में लोग एक-दूसरे की सहायता करने से भी कतराते हैं, तब यह पहल मानवीय संवेदनाओं, सामाजिक एकता और पारस्परिक सहयोग की ऐसी मिसाल प्रस्तुत करती है, जो हर गांव और हर समाज के लिए अनुकरणीय है।

जागृति स्वयं सहायता समूह की अध्यक्ष श्रीमती केकती, सचिव श्रीमती गिरजा तथा सदस्य श्रीमती पुष्पा वैष्णव, श्रीमती प्रमिला साहू, श्रीमती दशोदिया, श्रीमती ललिता यादव, श्रीमती अनिता यादव, श्रीमती देवबती साहू, श्रीमती नीमा साहू, श्रीमती राधा मेश्राम, श्रीमती जामुन साहू और श्रीमती नीरू यादव सहित सभी महिलाओं ने वर्षों से निस्वार्थ भाव से इस अभियान को निरंतर आगे बढ़ाया है।

इनकी मेहनत यह सिद्ध करती है कि समाज का वास्तविक विकास केवल योजनाओं से नहीं, बल्कि जनभागीदारी, अनुशासन और सामूहिक संकल्प से होता है। ग्राम खैरा की यह प्रेरक कहानी पूरे देश को संदेश देती है कि स्वच्छता केवल सरकार की जिम्मेदारी नहीं, बल्कि प्रत्येक नागरिक का नैतिक दायित्व है।

जब लोग अपने गांव, शहर और समाज को अपना परिवार मान लेते हैं, तब सम्मान या प्रसिद्धि की इच्छा स्वतः समाप्त हो जाती है और सेवा ही सबसे बड़ा धर्म बन जाती है। यदि देश के हर गांव में ऐसी सामूहिक चेतना विकसित हो जाए, तो स्वच्छ, संवेदनशील और आत्मनिर्भर भारत का सपना बहुत जल्द साकार हो सकता है।

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