गोपी साहू : हमारे शरीर में बहने वाला रक्त सिर्फ़ एक लिक्विड नहीं है, बल्कि जीवन की सबसे कीमती धारा है। जब यह धारा किसी और के शरीर में पहुँचती है, तो यह सिर्फ़ रक्त नहीं रह जाती यह एक नई शुरुआत, उम्मीद की एक नई किरण और जीवन का नया जन्म बन जाती है। ऐसी ही जीवनदायिनी सोच को साकार करते हुए ‘रक्तवीर’ जितेंद्र मानसिंग साहू ने 38वीं बार रक्तदान कर एक बार फिर मानवता की मिसाल पेश की। मेडिकल अस्पताल पेंड्री के ब्लड बैंक में उनका हर कदम मानो यह संदेश दे रहा था कि “जिंदगी बांटने से बढ़ती है।”

गौरतलब है कि, जब रक्त की एक-एक बूंद बैग में संचित हो रही थी, तब वह केवल एक प्रक्रिया नहीं थी… वह किसी अनजान व्यक्ति की धड़कनों को फिर से गति देने की तैयारी थी। शायद किसी मां की आंखों के आंसू रुकने वाले थे, किसी बच्चे को उसका पिता वापस मिलने वाला था, या किसी परिवार की बुझती उम्मीद फिर से जलने वाली थी।

रक्तदान के बाद जितेंद्र साहू ने बेहद सरल लेकिन गहरी बात कही,"हम सबके शरीर में बहता यह रक्त ईश्वर का दिया हुआ अमूल्य उपहार है। अगर यही रक्त किसी की रुकती सांसों को फिर से चला दे, तो इससे बड़ा कोई धर्म नहीं हो सकता।"

उनका यह सफर केवल 38 बार तक सीमित नहीं है, बल्कि यह 38 कहानियां हैं,जीवन बचाने की, उम्मीद जगाने की और इंसानियत को जिंदा रखने की। छात्र युवा मंच से मिली प्रेरणा ने उन्हें इस राह पर आगे बढ़ाया और आज वे खुद सैकड़ों युवाओं के लिए प्रेरणा की मशाल बन चुके हैं।

इस अवसर पर उनके मित्र और ग्राम पंचायत खुर्शीपार के युवा उप सरपंच भागवत वर्मा ने कहा—"जब अस्पतालों में खून की कमी होती है, तब जितेंद्र जैसे लोग ही जीवन के सच्चे रखवाले बनकर सामने आते हैं। उनका हर रक्तदान किसी चमत्कार से कम नहीं है।"

गर्मी के दिनों में जब ब्लड बैंक अक्सर खाली हो जाते हैं, तब ऐसे “रक्तवीर” ही समाज की असली ताकत बनते हैं। जितेंद्र साहू न केवल खुद हर तीन महीने में रक्तदान करते हैं, बल्कि रक्तदान शिविरों के आयोजन और जागरूकता फैलाने में भी पूरी निष्ठा से जुटे रहते हैं।

अस्पताल प्रबंधन द्वारा उन्हें प्रशस्ति पत्र देकर सम्मानित किया गया, लेकिन असली सम्मान तो उन अनगिनत दिलों की धड़कनों में है, जो उनके रक्त से फिर से चल पाई हैं। सिर्फ जीएं नहीं… किसी और को जीने का मौका भी दें।

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