गोविंद साव : भिलाई की सांस्कृतिक धरती पर एक बार फिर गौरव का सूरज चमका है। 69 वर्षीय प्रसिद्ध लोक कलाकार दुर्वासा कुमार टण्डन ने यह साबित कर दिया कि सच्ची लगन, निरंतर साधना और संस्कृति के प्रति अटूट प्रेम उम्र की सीमाओं को लांघ सकता है। इंटीग्रेटेड ग्लोबल यूनिवर्सिटी, नई दिल्ली ने उन्हें लोक कला के क्षेत्र में अद्वितीय योगदान के लिए मानद डॉक्टरेट की उपाधि प्रदान कर सम्मानित किया है। यह उपलब्धि न केवल टण्डन जी की व्यक्तिगत उपलब्धि है, बल्कि छत्तीसगढ़ की समृद्ध लोक परंपराओं की भी अंतरराष्ट्रीय स्तर पर पहचान है।

गौरतलब है कि, दुर्वासा कुमार टण्डन ने पिछले कई दशकों से लोक गीत, नृत्य और सांस्कृतिक विरासत को संरक्षित करने का कार्य किया है। उन्होंने गांव-गांव जाकर लोक संस्कृति को नई पीढ़ी से जोड़ने का बीड़ा उठाया और अपने सुरों से छत्तीसगढ़ी अस्मिता को जीवंत बनाए रखा। उनकी प्रस्तुतियों में केवल कला ही नहीं, बल्कि लोक जीवन की मिट्टी की सुगंध और जनमानस की भावनाओं की गूंज सुनाई देती है।

सम्मान मिलने पर दुर्वासा कुमार टण्डन ने इसे अपने गुरुओं, साथियों और छत्तीसगढ़ की जनता को समर्पित किया। उनका कहना है कि यह उपाधि उनके लिए प्रेरणा का स्रोत है, ताकि वे आने वाली पीढ़ियों को लोक संस्कृति का अमूल्य खजाना सौंप सकें। भिलाई ही नहीं, पूरे प्रदेश में इस उपलब्धि पर गर्व और उल्लास का माहौल है, जो यह संदेश देता है कि सच्ची कला हमेशा जीवंत होती है एवं समय के साथ और भी प्रखर होती जाती है।

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