- Post by Admin on Monday, Sep 21, 2026
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गोपी : मिज़ोरम की पहाड़ी राजधानी आइजोल के बिना निशान वाले चौराहों पर गाड़ियां अपनी बारी का इंतज़ार करती हैं, और सुबह की सबसे तेज़ आवाज़ अक्सर ड्राइवरों की धन्यवाद वाली विनम्र बीप की होती है। वहां से लगभग नौ सौ किलोमीटर दूर नागालैंड के बाडे गांव में 83 वर्षीय शेवोटसो कीहो 2021 से अपनी दुकान के काउंटर पर नहीं बैठे, फिर भी उनकी सब्ज़ियां बिकती हैं और पैसा उनकी जेब तक पहुंचता है।
पूर्वोत्तर के कई कोनों में ऐसी व्यवस्था चल रही है, जिसे बाकी जगहों पर टिकाए रखने के लिए पुलिस, कैमरे या जुर्माने की ज़रूरत पड़ती। आइजोल को "शांत शहर" का उपनाम यूं ही नहीं मिला। इसके कई चौराहों पर ट्रैफिक लाइटें नहीं हैं, और कांस्टेबल की सीटी और हाथ का इशारा ही वाहनों को आगे बढ़ाने के लिए काफ़ी होता है। कारें बाईं ओर और दोपहिया वाहन दाईं ओर चलते हैं, और बिना चेतावनी दिए लेन बदलना मिज़ो संस्कृति में बेहद शर्मनाक माना जाता है। मिज़ोरम पुलिस इसका श्रेय वर्षों से चल रहे स्कूली जागरूकता अभियानों को देती है, जिनसे आइजोल देश का "हॉर्न-मुक्त शहर" बना। चार लाख से अधिक आबादी वाली इस राजधानी में सिग्नल और भारी पुलिस बल के बिना भी व्यस्त समय में वैसा जाम कम ही लगता है, जैसा अधिकांश भारतीय शहरों में दिखता है।
मिज़ोरम और नागालैंड के राजमार्गों के किनारे बिना दुकानदार की दुकानें उतनी ही आम हैं जितनी शांत सड़कें। आइजोल से 65 किलोमीटर दूर सेलिंग के पास किसान लकड़ी के रैक पर फल, सब्ज़ियां और फूल सजाकर रख देते हैं। साथ में हाथ से लिखी मूल्य सूची और पैसे डालने का एक जार होता है, और उन्हें भरोसा रहता है कि यात्री जितना सामान लेंगे, उतना ही भुगतान करेंगे। स्थानीय भाषा में इस प्रथा को "न्गाह लोह दावर" यानी बिना दुकानदार की दुकान कहा जाता है। बाडे में कीहो हर सुबह अपनी जैविक उपज बाहर रख देते हैं। ग्राहक सही खुले पैसे रख जाते हैं, और अगर उनके पास कम पैसे हों तो ज़रूरत का सामान लेकर बाद में भुगतान कर देते हैं। एक अन्य दुकानदार रितु खामो के अनुसार फसल के आधार पर उनकी दैनिक कमाई 200 से 3,000 रुपये के बीच रहती है, और कम पैसे देने वाले ग्राहक अक्सर वापस आने का वादा लिखकर एक नोट छोड़ जाते हैं। यह विचार अब पश्चिम की ओर भी फैल रहा है।
असम के गोलाघाट ज़िले में चाय बागान के श्रमिकों ने, जिनके पास दुकान पर बैठने का समय नहीं होता, सोशल मीडिया पर यह अवधारणा देखकर इसे अपनाया। वे अब चावल, सब्ज़ियां और बत्तख का मांस बिना निगरानी के बेचते हैं। बिना निगरानी के भरोसे की यह संस्कृति सड़कों और दुकानों तक सीमित नहीं है। मेघालय का मावलिननॉन्ग गांव "डोरबार श्नोंग" नाम की पारंपरिक परिषद के ज़रिए खुद को साफ़-सुथरा रखता है, जिसमें कोई नगरपालिका कर्मचारी नहीं होता। यह प्रथा 1880 के दशक में फैले हैज़े के प्रकोप के समय की है, जब स्वच्छता जीवन-मरण का सवाल बन गई थी, और तब से इसने मावलिननॉन्ग को एशिया के सबसे स्वच्छ गांवों में शामिल कराया है। मिज़ोरम ने शिक्षा में भी यही राह चुनी। 20 मई, 2025 को उल्लास कार्यक्रम के तहत वह "भारत का पहला पूर्णतः साक्षर राज्य" बना, जब 292 स्वयंसेवी शिक्षकों, जिनमें कई छात्र और गृहिणियां थीं, ने 1,692 वयस्कों को पढ़ाकर 95% साक्षरता का आंकड़ा पार कराया और राज्य की साक्षरता दर 98.2% पर पहुंचाई।
पर्यावरण और अर्थव्यवस्था में भी समुदायों ने अपने फ़ैसले खुद लिए। नागालैंड के खोनामा में 1998 में ग्रामीणों ने एक सप्ताह के संघर्ष में लगभग 300 लुप्तप्राय ब्लिथ ट्रैगोपैन पक्षियों को मार डाला था। इसके बाद बुज़ुर्गों ने 125 वर्ग किलोमीटर क्षेत्र में शिकार और लकड़ी कटाई पर प्रतिबंध लगा दिया। यह आदेश वन विभाग का नहीं, ग्राम परिषद का अपना फ़ैसला था, और इससे खोनामा एशिया का पहला स्व-घोषित "हरित गांव" बना।
मणिपुर के इम्फाल में "इमा कीथेल" यानी "माताओं का बाज़ार" 16वीं सदी से पूरी तरह महिलाओं द्वारा चलाया जा रहा है। लगभग 5,000 विक्रेता खुद तय करते हैं कि कौन व्यापार करेगा, दुकानें मां से बेटी को सौंपी जाती हैं और आंतरिक ऋण संघ चलते हैं, जबकि रोज़ के कामकाज को संभालने वाला कोई सरकारी निकाय नहीं है।
यह सब छोटे-छोटे, बार-बार लिए गए फ़ैसलों से पनपा है: ड्राइवर का अपनी बारी का इंतज़ार करना, किसान का मूल्य सूची छोड़ देना, गांव का अपनी सफ़ाई खुद करने पर सहमत होना, शिकारी का बंदूक नीचे रख देना, और व्यापारी का दुकान अपनी बेटी को सौंप देना। इनमें से कोई भी कदम अकेले बड़ा नहीं लगता, पर मिलकर उन्होंने ऐसा ढांचा खड़ा किया जो अधिकांश सीधे हस्तक्षेपों से ज़्यादा मज़बूत है। जो देश अपनी नागरिक समस्याओं के लिए अक्सर बड़े बजट और सख़्त कानूनों की ओर देखता है, उसके लिए पूर्वोत्तर का सबक शांत लेकिन साफ़ है: सबसे टिकाऊ व्यवस्थाएं वे हैं जिनकी निगरानी करने की कभी ज़रूरत ही नहीं पड़ती।
स्रोत: द क्विंट (इसहाक ज़ोरमसांगा, 17 मई 2022); मिज़ोरम पुलिस का आधिकारिक पृष्ठ; द मोरंग एक्सप्रेस (एच. अंगुवी चिशी, 29 अप्रैल 2026)
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