चंदन नयाल : 11 अक्टूबर 2026 की सुबह लगभग 11 बजे, जब सूरज की किरणें पिंडर घाटी को स्वर्णिम आभा से नहला रही थीं, हमारे सफ़र की शुरुआत हुई। प्रारंभिक बिंदु था कुमाऊँ का अंतिम सीमांत गाँव खाती। यहाँ से 12 किलोमीटर का पैदल रास्ता तय कर हम द्वाली पहुँचे। द्वाली वह पड़ाव है जहाँ हिमालय दो रास्तों में बँट जाता है। एक रास्ता भव्य पिंडारी ग्लेशियर की ओर जाता है, तो दूसरा रहस्यमयी और दुर्गम कफनी ग्लेशियर की गोद में।

द्वाली की सांझ: ज्ञान और संस्मरणों का संगम द्वाली के KMVN (कुमाऊँ मंडल विकास निगम) गेस्ट हाउस में हमारी भेंट पद्मश्री अनूप शाह जी और प्रख्यात वनस्पतिशास्त्री व पर्वतारोही डॉ. जी. एस. रावत से हुई। अलाव की गर्मी और हिमालय की शांत वादियों के बीच एक-दो घंटे कब बीत गए, पता ही नहीं चला। फ्लोरा-फॉना और हिमालयी वनस्पतियों पर कई पुस्तकें लिख चुके डॉ. रावत ने हमें यहाँ की जैव-विविधता से परिचित कराया। अनूप शाह जी ने अपने पर्वतारोहण के अनुभवों के कई किस्से साझा किए। जलवायु परिवर्तन, उच्च हिमालयी जीवन और दुर्लभ वनस्पतियों पर हुई यह चर्चा हमारी यात्रा की वैचारिक नींव बन गई।

इस अभियान में हमारे मार्गदर्शक थे अनुभवी पर्वतारोही जितेंद्र दानू। उनके साथ सहयोगी राजू दानू और प्रदीप दानू का कुशल सहयोग हमें मिला। झाड़ियों, भूस्खलन और कठिन राहों से मुकाबला 12 अक्टूबर की सुबह अनूप शाह जी और डॉ. रावत पिंडारी की ओर बढ़ गए, जबकि हमारी टीम ने कफनी ग्लेशियर की राह पकड़ी। वर्ष 2013 की भीषण आपदा के बाद कफनी का ट्रैक पूरी तरह सुचारु नहीं हो सका है। द्वाली से ऊपर चढ़ते ही पूरा रास्ता बंद मिला। रिंगाल की सघन झाड़ियों और काँटों के बीच हमें खुद रास्ता तलाशना पड़ा। द्वाली से महज़ आधा किलोमीटर आगे एक विशाल भूस्खलन ने रास्ता रोक लिया।

रास्ता नाम की कोई चीज़ बची ही नहीं थी। हमें दरकती पहाड़ी पर पेड़ों की टहनियाँ और जड़ें थामकर ऊपर चढ़ना पड़ा। एक भूस्खलन पार किया तो उससे भी भयावह दूसरा सामने खड़ा था। पत्थरों और मलबे के किनारे-किनारे, झाड़ियों को चीरते हुए हम अत्यंत कठिन और साहसिक सफ़र के बाद खटिया (द्वाली से लगभग 7 किमी) पहुँचे। खटिया से आगे, जीरो पॉइंट से कुछ पहले, हमें एक टीन शेड मिला। वहीं हमने अपना कैंप लगाया। शाम ढलते-ढलते हम कफनी ग्लेशियर के जीरो पॉइंट के मुहाने पर अपना ठिकाना बना चुके थे।

नंदा कोट की स्वर्णिम भोर और कफनी का उद्गम 13 अक्टूबर की सुबह आँख खुलते ही प्रकृति ने अपना सबसे अलौकिक रूप दिखाया। सामने खड़ी नंदा कोट और नंदा भनार की बर्फ़ीली चोटियों पर जब सूर्य की पहली किरणें पड़ीं, तो वे सोने की तरह दमक उठीं। आगे बढ़ने पर विशाल कफनी ग्लेशियर का विहंगम दृश्य साफ़ होता गया। एक-दो किलोमीटर चलकर हम सुनोट पहुँचे, वह पावन स्थल जहाँ से कफनी नदी का उद्गम होता है।

यहाँ गाइड जितेंद्र दानू के साथ आसपास की चोटियों, औषधीय पौधों और पौराणिक नंदकुंड पर विस्तार से चर्चा हुई। ग्लेशियर की गोद में: भरल, नंदी झील और बदलता मौसम सुनोट से आगे हम सीधे हिमनद पर चढ़े। बर्फ़ पर कदम रखते ही प्रकृति ने पहला उपहार दिया। सामने पथरीली चट्टानों पर तीन-चार भरल (ब्लू शीप) का झुंड सहजता से विचरण कर रहा था। ग्लेशियर पार कर हम नंदकुंड की ओर स्थित एक ऊँची चोटी पर पहुँचे, जहाँ एक शांत और सुंदर छोटी झील, नंदी झील, के दर्शन हुए। तभी मौसम ने करवट ली और आसमान पर बादल घिरने लगे।

हालात देखते हुए हमने तुरंत उतरना उचित समझा और बेस टेंट लौट आए। हिमालयी वन्यजीवन का अद्भुत नज़ारा: टेंट के पास पहुँचते ही जो दृश्य दिखा, उसने दिन भर की थकान मिटा दी। बुग्याल (मखमली घास के मैदान) में लगभग 25 से 30 मोनाल पक्षियों का झुंड, नर और मादा दोनों, आराम से घूम रहा था। बुग्याल के विशाल पत्थरों पर उगी बूगी घास और पीछे बर्फ़ से ढकी चोटियाँ, मानो किसी चित्रकार की कल्पना साकार हो उठी हो। शाम ढलते-ढलते एक और चमत्कार हुआ। लगभग 10 से 12 भरलों का एक और झुंड हमारे टेंट के बेहद करीब से गुज़रा। दुर्लभ हिम तेंदुआ (Snow Leopard) हमें सीधे तो नहीं दिखा, लेकिन सुनोट के आसपास बर्फ़ और मिट्टी पर उसके ताज़ा पदचिह्न (पगमार्क) देखकर रोंगटे खड़े हो गए।

अगले दिन वापसी का सफ़र शुरू हुआ। रास्ते में हमें जंगली थार (हिमालयन ताहर) के दर्शन भी हुए। उसी दिन हमने जीरो पॉइंट से 25 से 30 किलोमीटर का लंबा और थका देने वाला पैदल सफ़र तय कर खाती गाँव में कदम रखा। कफनी का रास्ता बेहद विकट और क्षतिग्रस्त है, इसलिए आम पर्यटक यहाँ आने से कतराते हैं। फिर भी प्राकृतिक सौंदर्य, जैव-विविधता और एकांत शांति के लिहाज़ से कफनी एक अतुलनीय हिमनद है। यह केवल एक ट्रेक नहीं, बल्कि एक सार्थक अध्ययन भ्रमण था।

इसने हमें उच्च हिमालयी पारिस्थितिकी, दुर्लभ औषधीय वनस्पतियों, फ्लोरा-फॉना और प्रकृति के अनसुलझे पहलुओं को समझने का अमूल्य अवसर दिया। हिमालय की गोद में बिताए ये क्षण हमारी स्मृतियों में सदा जीवित रहेंगे। "कफनी की दुर्गम राहें, बुग्यालों में विचरते मोनाल और स्वर्णिम चोटियाँ, यह सफ़र महज़ रास्तों का नहीं, बल्कि आत्मा का हिमालय से साक्षात्कार था।"

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