कमलेश यादव; सुबह की हल्की धूप में सड़क पर एक ट्रक दौड़ा चला आ रहा है। राह चलते लोग गर्दन घुमाकर देखते हैं और ठिठक जाते हैं, क्योंकि स्टीयरिंग पर कोई पुरुष नहीं, एक युवती बैठी है। चेहरे पर भरोसा है और हाथ गाड़ी पर पूरी मज़बूती से जमे हैं। यही हैं छत्तीसगढ़ की काजल खारी, जिन्हें लोग प्यार से "दबंग लेडी ट्रक ड्राइवर" कहते हैं।

गौरतलब है कि, अमलेश्वर की रहने वाली काजल का गाड़ियों से रिश्ता बचपन में ही जुड़ गया था। जिस उम्र में ज़्यादातर बच्चे साइकिल चलाना सीखते हैं, उस उम्र में उन्होंने गाड़ी का स्टीयरिंग थाम लिया। बताया जाता है कि उन्होंने करीब 12 साल की उम्र में गाड़ी चलाना शुरू किया था। शौक धीरे-धीरे जुनून बना, और जुनून आगे चलकर उनकी पहचान बन गया।

भारी वाहन चलाना कोई आसान काम नहीं है। ट्रक, हाइवा और जेसीबी जैसी विशाल गाड़ियों को संभालने के लिए ताकत के साथ धैर्य और सूझबूझ भी चाहिए। लंबे सफ़र हैं, धूल और धूप है, और ऊपर से समाज की वह पुरानी सोच भी कि "यह लड़कियों का काम नहीं।" काजल ने इन सबके बीच डरकर पीछे हटने के बजाय अपना रास्ता चुना। करीब 21 साल की उम्र से वे ट्रक चला रही हैं और छत्तीसगढ़ की पहली महिला ट्रक ड्राइवर के रूप में जानी जाती हैं।

काजल की सबसे ख़ास बात यह है कि उन्होंने अपनी पहचान के साथ कभी समझौता नहीं किया। कभी साड़ी में, कभी सूट में, यहां तक कि दुल्हन के जोड़े में भी ट्रक चलाते हुए उनके वीडियो सोशल मीडिया पर खूब वायरल हुए। इन वीडियो ने सबको एक ही संदेश दिया कि काम कपड़ों से नहीं, हुनर से होता है। जो हाथ सलीके से सिंदूर और चूड़ियां संभाल सकते हैं, वही हाथ टनों वज़नी ट्रक को भी संभाल सकते हैं।

आज काजल सिर्फ़ ट्रक चलाने तक सीमित नहीं हैं। वे जेसीबी, कार और बाइक भी चलाती हैं और अपने वीडियो के ज़रिए लाखों लोगों तक हौसले की बात पहुंचा रही हैं। सोशल मीडिया पर उन्हें चाहने वालों की संख्या लगातार बढ़ रही है। इनमें बड़ी संख्या उन बेटियों की है, जो गांव-कस्बों में रहकर कुछ अलग करने का सपना देखती हैं।

काजल को देखकर कई लड़कियों के मन में अब यह सवाल उठता है कि अगर काजल कर सकती हैं, तो हम क्यों नहीं? यही सवाल बदलाव की असली शुरुआत है। जब एक बेटी रास्ता बनाती है, तो उसके पीछे चलने वाली सैकड़ों बेटियों के लिए सफ़र आसान हो जाता है। काजल आज वही रास्ता बना रही हैं, जिस पर चलकर आने वाली पीढ़ी अपने सपनों तक पहुंच सकती है।

Share

अन्य समाचार

01-11-2021-viddhya-rajput-in-raipur

सिर्फ आवाज़ नहीं, रोज़गार और सम्मान की लड़ाई: विद्या राजपूत की जिद - ऐसा समाज जहाँ ट्रांसजेंडर को पहचान न छिपानी पड़े

आज मितवा समिति रायपुर के सरोना में "गरिमा गृह" चलाती है। यहाँ समाज से बहिष्कृत 18 से 60 साल के ट्रांसजेंडरों को आश्रय मिलता है। सिलाई, कढ़ाई, ब्यूटीशियन, सेल्फ डिफेंस, कुकिंग, स्किल डेवलपमेंट की ट्रेनिंग दी जाती है। विद्या के अनुसार यहाँ से ट्रेनिंग लेने वाले 50% लोगों को बड़ी कंपनियों और सरकारी नौकरियों में जॉब मिल जाती है।


Read More...
img-20261012-wa7520

सुई-धागे से टूटे हौसलों को जोड़ती श्रीमती कुसुम जितेंद्र साहू

उनकी कहानी हर उस महिला के लिए संदेश है जो मुश्किलों से घिरी है कि हाथ में हुनर और दिल में हिम्मत हो, तो अंधेरा चाहे कितना भी गहरा हो, सुबह ज़रूर होती है।


Read More...
img-20261010-wa2090

पंचायतीनामा...अपना काम खुद कर लो...जहां लिखी जाती है आत्मनिर्भरता की नई इबारत...जनसहयोग से लाफिन कला ने खुद लिखी विकास की नई कहानी

50 लाख के काम, 40 हजार वर्गफीट का कांक्रीट गौठान, तालाब के बीच बन रहा 25 लाख का मंदिर, और कलेक्टर बोले- दूसरे गांव भी लें सीख


Read More...
newindianexpress-2026-10-07-8mhpfhem-img-20261006-wa0053

दंतेवाड़ा के आदिवासी बच्चों ने रचा इतिहास, 11 छात्र बनेंगे डॉक्टर

'छू लो आसमान' से निकले छात्रों को MBBS और BDS में दाखिला, दो ने JEE पास कर NIT रायपुर में लिया प्रवेश


Read More...
g

रोशनी से चलेगा दिमाग का "स्विच"...ऑप्टोजेनेटिक्स की खोज के लिए तीन वैज्ञानिकों को 2026 का चिकित्सा नोबेल

कभी कल्पना थी, आज हकीकत है: प्रकाश की किरण से जीवित मस्तिष्क की कोशिकाओं को चालू-बंद करने की तकनीक ने बदल दी न्यूरोसाइंस की दुनिया


Read More...
img-20260921-080636

ड्राइवर का अपनी बारी का इंतज़ार करना, किसान का मूल्य सूची छोड़ देना, गांव का अपनी सफ़ाई खुद करने पर सहमत होना...पूर्वोत्तर भारत की नागरिक चेतना

मिज़ोरम की पहाड़ी राजधानी आइजोल के बिना निशान वाले चौराहों पर गाड़ियां अपनी बारी का इंतज़ार करती हैं, और सुबह की सबसे तेज़ आवाज़ अक्सर ड्राइवरों की धन्यवाद वाली विनम्र बीप की होती है।


Read More...
img-20260918-wa0585

आर्ना फाउंडेशन की कहानी....रायपुर की चमक के पीछे छूटे दर्द को एक महिला ने कैसे बनाया हजारों की उम्मीद

समाजसेविका रुना शर्मा को समझने के लिए किसी परिचय की जरूरत नहीं, बस इतना काफी है कि उन्होंने वो देखा जो अक्सर लोग देखकर भी अनदेखा कर देते हैं।


Read More...
img-20260916-075505

मिठाई नहीं, स्टेशनरी दो...गणपति उत्सव के जरिए इस दंपत्ति ने बदली 400 आदिवासी बच्चों की जिंदगी

त्योहार सिर्फ खुशियां मनाने का मौका नहीं, बल्कि जरूरतमंदों की मदद करने का भी जरिया बन सकता है यही साबित कर रहे हैं मुंबई के पूजा और दीपेश देधिया।


Read More...
img-20260915-070734

भारत की गड्ढों की समस्या का समाधान डेनमार्क से मिला: फाइबर-प्रबलित सड़कों का परीक्षण शुरू

भारत में सड़क के गड्ढे कोई मामूली परेशानी नहीं हैं सरकारी आंकड़ों के अनुसार इनसे जुड़ी दुर्घटनाएं हर साल हजारों में होती हैं, और सर्वोच्च न्यायालय तक टिप्पणी कर चुका है कि आतंकवादी हमलों से ज़्यादा भारतीय खराब सड़कों के कारण मरते हैं।


Read More...
img-20260913-wa0000

कबाड़ से जुगाड़, और जुगाड़ से रोचक विज्ञान: वनांचल के उस टीचर की कहानी जो बच्चों को वैज्ञानिक बना रहा है

विज्ञान शिक्षक पुरानी साइकिल की डायनेमो से बिजली बनाकर बल्ब रोशन करना, कागज की नाव को फूँक से चलाना और गुब्बारे से रॉकेट उड़ाना जैसे प्रयोग करवाते हैं। उनके लिए ये खिलौने नहीं, बल्कि विज्ञान को दैनिक जीवन से जोड़ने की प्रयोगशाला है।


Read More...