कमलेश यादव : मुंबई की एक तंग झुग्गी बस्ती की गलियों में एक लड़का बड़े सपने लेकर बड़ा हो रहा था। उसका नाम था संतोष यादव। चारों ओर गरीबी, सीमित संसाधन और संघर्षों से भरा माहौल था, लेकिन उसके मन में कुछ बड़ा करने की चाह थी। बचपन में उसे क्रिकेट का बेहद शौक था, मगर पढ़ाई में लगातार आने वाली कठिनाइयों ने उसके आत्मविश्वास को कई बार तोड़ दिया। दसवीं की परीक्षा में खराब प्रदर्शन के बाद ऐसा लगने लगा कि शायद उसके सपनों की उड़ान यहीं रुक जाएगी।

स्कूल में साइंस में प्रवेश नहीं मिलने से संतोष निराश हो गया। तभी पिता के एक मित्र ने उसे कंप्यूटर साइंस डिप्लोमा करने की सलाह दी। यह उसके जीवन का पहला बड़ा मोड़ था। अंग्रेजी भाषा उसकी सबसे बड़ी कमजोरी थी। नए माहौल में वह खुद को असहज महसूस करता था। कई बार कक्षा में बैठकर उसकी आंखों से आंसू निकल आते थे। उसे डर था कि कहीं वह फिर असफल न हो जाए। लेकिन भीतर कहीं एक जिद जाग चुकी थी कि अब हार नहीं माननी है। समय आगे बढ़ा, लेकिन चुनौतियां भी बढ़ती गईं।

कॉलेज के दिनों में अचानक उसके पिता की नौकरी चली गई। घर की आर्थिक स्थिति इतनी खराब हो गई कि कंप्यूटर साइंस की फीस भरना भी मुश्किल हो गया। एक रात संतोष चिंता में डूबा रहा। वह पूरी रात जागकर रोता रहा। उसे लग रहा था कि अब उसकी पढ़ाई अधूरी रह जाएगी और उसके सारे सपने बिखर जाएंगे।

अगली सुबह उसकी मां ने उसकी उदासी और बेबसी को महसूस किया। उन्होंने पिता से दृढ़ स्वर में कहा, "तुम्हें जो करना है करो, लेकिन मेरा बेटा अपनी पढ़ाई जारी रखेगा।" मां के इन शब्दों ने संतोष के भीतर नई ऊर्जा भर दी। उस दिन उसे एहसास हुआ कि उसके सपनों के पीछे उसके परिवार का संघर्ष और त्याग खड़ा है। उसने मन ही मन संकल्प लिया कि वह हर हाल में सफल होकर अपने माता-पिता के विश्वास को सच साबित करेगा।

स्नातक की पढ़ाई पूरी होते ही वर्ष 2008 का वैश्विक आर्थिक संकट आ गया। नौकरियां मिलना मुश्किल हो गया। मजबूरी में संतोष ने मात्र 5,000 रुपये महीने की नौकरी स्वीकार कर ली। लेकिन उसने परिस्थितियों को अपनी मंजिल के रास्ते की दीवार नहीं बनने दिया। दिन में नौकरी और रात में सीखना, यही उसकी दिनचर्या बन गई। उसने नई तकनीकों पर काम किया, ओपन-सोर्स प्रोजेक्ट्स में योगदान दिया और लगातार अपनी क्षमताओं को निखारता रहा।

आज वही संतोष यादव दुनिया के तकनीकी क्षेत्र में एक सम्मानित नाम हैं। मुंबई की झुग्गी बस्ती से निकलकर वह जर्मनी में प्रिंसिपल डेवलपर एडवोकेट के पद पर कार्यरत हैं, गूगल डेवलपर एक्सपर्ट हैं, भारत के पहले GitHub स्टार हैं और अंतरराष्ट्रीय मंचों पर अपने विचार साझा करते हैं। उनकी कहानी बताती है कि सपनों की ऊंचाई आपकी परिस्थितियां तय नहीं करतीं, बल्कि आपका संघर्ष, आपका संकल्प और परिवार का विश्वास तय करता है। मां के एक वाक्य ने जिस बेटे को टूटने से बचाया था, उसी बेटे ने आज दुनिया के सामने सफलता की नई मिसाल कायम कर दी।

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