- Post by Admin on Thursday, Jun 04, 2026
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कमलेश यादव : कई लोग जीवन में धन, पद और प्रसिद्धि के सपने देखते हैं, लेकिन कुछ ऐसे भी होते हैं जो अपने सपनों में दूसरों का भविष्य संवारने की चाह रखते हैं। कर्नाटक के 79 वर्षीय अंके गौड़ा ऐसे ही व्यक्तित्व हैं, जिन्होंने अपने जीवन का सबसे बड़ा उद्देश्य किताबों को लोगों तक पहुंचाना बनाया। जिस व्यक्ति ने बचपन में किताबों की कमी का दर्द झेला, उसी ने आगे चलकर लाखों किताबों का ऐसा संसार खड़ा कर दिया, जो आज हजारों विद्यार्थियों और शोधार्थियों के सपनों को पंख दे रहा है।
मांड्या जिले के एक साधारण किसान परिवार में जन्मे अंके गौड़ा का बचपन अभावों के बीच बीता। उस समय गांवों में किताबें आसानी से उपलब्ध नहीं थीं। पढ़ने की ललक तो थी, लेकिन संसाधन सीमित थे। कई बार उन्हें केवल एक पुस्तक पाने के लिए दूर-दूर तक सफर करना पड़ता था। यही संघर्ष उनके मन में एक संकल्प बनकर बस गया कि भविष्य में किसी बच्चे को केवल गरीबी या संसाधनों की कमी के कारण शिक्षा से वंचित नहीं होना पड़े।
जीवन आसान नहीं था। परिवार की जिम्मेदारियों को निभाने के लिए उन्होंने बस कंडक्टर से लेकर चीनी मिल कर्मचारी, दूध विक्रेता और बीमा एजेंट तक कई काम किए। आमदनी सीमित थी, लेकिन किताबों के प्रति उनका प्रेम असीम था। वे अपनी जरूरतों में कटौती कर लेते, लेकिन जहां भी कोई अच्छी पुस्तक दिखाई देती, उसे अपने संग्रह में शामिल करने का प्रयास जरूर करते। उनके लिए हर किताब केवल कागज का पुलिंदा नहीं, बल्कि किसी के उज्ज्वल भविष्य की संभावना थी।
धीरे-धीरे यह शौक एक मिशन में बदल गया। वर्षों तक उन्होंने दुर्लभ पुस्तकें, पत्रिकाएं, शोध सामग्री, शब्दकोश और विभिन्न भाषाओं के साहित्य को एकत्रित किया। उनके घर का हर कोना किताबों से भरने लगा। परिवार ने भी इस जुनून को समझा और उनका साथ दिया। समय के साथ यह संग्रह इतना विशाल हो गया कि उसने एक भव्य पुस्तकालय का रूप ले लिया।
आज "पुस्तक माने" नाम से प्रसिद्ध यह पुस्तकालय लगभग 20 लाख पुस्तकों का खजाना बन चुका है। यहां स्कूली बच्चों से लेकर प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी करने वाले युवा, शिक्षक, शोधार्थी और ज्ञान के प्यासे लोग निःशुल्क अध्ययन कर सकते हैं। अंके गौड़ा, उनकी पत्नी विजयलक्ष्मी और पुत्र सागर स्वयं इस पुस्तकालय की देखभाल करते हैं और यह सुनिश्चित करते हैं कि हर आगंतुक को ज्ञान का यह खजाना खुले दिल से उपलब्ध हो।
उनकी इस अद्भुत सेवा और शिक्षा के प्रति समर्पण को देखते हुए भारत सरकार ने उन्हें पद्म श्री सम्मान से अलंकृत किया। यह सम्मान केवल एक व्यक्ति का नहीं, बल्कि उस सोच का सम्मान है जो मानती है कि समाज की सबसे बड़ी पूंजी शिक्षा और ज्ञान है। अंके गौड़ा ने यह साबित कर दिया कि बदलाव लाने के लिए बड़े संसाधनों की नहीं, बल्कि बड़े संकल्प की आवश्यकता होती है।
अंके गौड़ा की कहानी हमें सिखाती है कि यदि किसी व्यक्ति के भीतर समाज के लिए कुछ करने की सच्ची भावना हो, तो साधारण परिस्थितियां भी असाधारण परिणाम पैदा कर सकती हैं। एक समय जो बालक किताबों की तलाश में मीलों चलकर जाता था, आज उसने ऐसा ज्ञान मंदिर खड़ा कर दिया है जहां लाखों संभावनाएं जन्म ले रही हैं। उनकी जीवन यात्रा यह संदेश देती है कि एक अच्छी किताब केवल जीवन नहीं बदलती, बल्कि उससे जुड़ा एक संकल्प पूरे समाज का भविष्य बदल सकता है।
स्रोत:
'कभी बस कंडक्टर रहे, अब पद्म पुरस्कार विजेता: अंके गौड़ा कौन हैं, वो व्यक्ति जिन्होंने 20 लाख किताबों के साथ भारत का सबसे बड़ा मुफ्त पुस्तकालय बनाया' - इकोनॉमिक टाइम्स द्वारा 25 जनवरी 2026 को प्रकाशित।
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