रजनी जोशी : तमिलनाडु के एक छोटे से गांव का वह व्यक्ति, जिसे कभी लोग तानों और उपहास का पात्र समझते थे, आज पूरी दुनिया में बदलाव की मिसाल बन चुका है। जिस विषय पर समाज खुलकर बात करने से कतराता था, उसी मासिक धर्म स्वच्छता को लेकर अरुणाचलम मुरुगनाथम ने ऐसा साहसिक कदम उठाया कि आज उनका नाम 2026 के नोबेल शांति पुरस्कार के लिए नामांकित किया गया है। यह केवल एक व्यक्ति की सफलता नहीं, बल्कि उस सोच की जीत है जो समाज की चुप्पी को चुनौती देने का साहस रखती है।

सन् 1990 के दशक के आखिर में शादी के कुछ समय बाद मुरुगनाथम को यह पता चला कि उनकी पत्नी महंगे सैनिटरी पैड खरीदने में असमर्थ थीं और मजबूरी में पुराने कपड़ों व अखबारों का उपयोग करती थीं। यह बात उन्हें भीतर तक झकझोर गई। जब उन्होंने गांव और आसपास की महिलाओं की स्थिति देखी, तो उन्हें एहसास हुआ कि यह केवल उनके घर की समस्या नहीं, बल्कि करोड़ों महिलाओं की पीड़ा है, जिसे समाज ने वर्षों से नजरअंदाज किया हुआ है।

बिना किसी तकनीकी शिक्षा और सीमित संसाधनों के बावजूद उन्होंने सस्ते सैनिटरी पैड बनाने की दिशा में प्रयोग शुरू किए। इस दौरान उन्हें समाज के ताने, अपमान और अकेलेपन का सामना करना पड़ा। यहां तक कि उनकी पत्नी भी कुछ समय के लिए उनसे दूर चली गईं। लेकिन उन्होंने हार नहीं मानी। महिलाओं की तकलीफ को समझने के लिए उन्होंने स्वयं पर प्रयोग तक किए। उनका यही जुनून आगे चलकर एक क्रांतिकारी बदलाव का कारण बना।

मुरुगनाथम ने केवल कम लागत वाले सैनिटरी पैड नहीं बनाए, बल्कि ऐसी मशीन तैयार की जो गांवों में ही महिलाओं द्वारा संचालित की जा सके। यह मशीन कम लागत में स्थानीय स्तर पर सैनिटरी पैड तैयार करती है। आज उनकी मशीनें भारत के 27 राज्यों और दुनिया के 100 से अधिक देशों में पहुंच चुकी हैं। अफ्रीका, दक्षिण-पूर्व एशिया और लैटिन अमेरिका तक इस मॉडल ने महिलाओं के जीवन में सकारात्मक बदलाव लाया है।

इस पहल का सबसे बड़ा प्रभाव यह रहा कि हजारों महिलाओं को रोजगार और आत्मनिर्भरता का अवसर मिला। स्वयं सहायता समूहों द्वारा संचालित ये इकाइयां न केवल सस्ते पैड उपलब्ध करा रही हैं, बल्कि गांवों में महिलाओं के लिए सम्मानजनक आय का माध्यम भी बन रही हैं। जहां पहले मासिक धर्म के कारण लड़कियां स्कूल छोड़ने को मजबूर हो जाती थीं, वहीं अब जागरूकता और उपलब्धता के कारण उनकी शिक्षा प्रभावित होने की घटनाएं कम हुई हैं।

2026 के नोबेल शांति पुरस्कार के लिए उनका नामांकन इस बात का प्रमाण है कि शांति केवल युद्ध रोकने से नहीं आती, बल्कि समाज की असमानताओं को मिटाने से भी आती है। मुरुगनाथम ने मासिक धर्म जैसे संवेदनशील विषय को सामाजिक चर्चा का हिस्सा बनाया। उन्होंने यह साबित किया कि यदि किसी समस्या को समझने और बदलने की सच्ची इच्छा हो, तो एक साधारण इंसान भी करोड़ों लोगों के जीवन में क्रांति ला सकता है।

आज भी अरुणाचलम मुरुगनाथम अपने सामाजिक उद्यम के माध्यम से महिलाओं को प्रशिक्षित करने, जागरूकता फैलाने और मासिक धर्म से जुड़े कलंक को समाप्त करने के लिए लगातार कार्य कर रहे हैं। उनकी कहानी हमें यह सिखाती है कि बदलाव हमेशा बड़े संसाधनों से नहीं, बल्कि बड़े इरादों से आता है। कभी जिस व्यक्ति को समाज ने हंसी का पात्र बनाया था, वही आज दुनिया के लिए उम्मीद और प्रेरणा का प्रतीक बन चुका है।

स्रोत: ' भारत के पद्ममन ने कहा, नोबेल शांति पुरस्कार के लिए मेरा नामांकन स्वीकार कर लिया गया है ': टाइम्स ऑफ इंडिया द्वारा प्रकाशित, 4 मई 2026 '

पद्मन अरुणाचलम मुरुगनाथम को 2026 के नोबेल शांति पुरस्कार के लिए नामांकित किया गया' : द टाइम्स ऑफ इंडिया (एएनआई) द्वारा 3 मई 2026 को प्रकाशित। '

असली पद्ममानव अरुणाचलम मुरुगनाथम 2026 के नोबेल शांति पुरस्कार के नामांकित व्यक्तियों की सूची में शामिल ': हिंदुस्तान टाइम्स द्वारा 3 मई 2026 को प्रकाशित।

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