गोपी साहू : मध्य प्रदेश के दिंडोरी जिले के समनापुर ब्लॉक में स्थित रंजारा गाँव, मैकाल पर्वतमाला के घने साल जंगलों के बीच बसा एक छोटा-सा बैगा बहुल क्षेत्र है। लगभग 172 परिवारों और 854 लोगों की आबादी वाला यह गाँव पूरी तरह से जंगल पर निर्भर जीवन जीता है। महुआ, तेंदू, चार जैसे गैर-लकड़ी वन उत्पाद यहाँ की आजीविका का मुख्य आधार हैं, जबकि जंगल उनके सांस्कृतिक और आध्यात्मिक जीवन का भी केंद्र है।

गौरतलब है कि, पृथ्वी दिवस 2026 के अवसर पर यह गाँव एक अनोखी पहल के कारण चर्चा में आया है। ग्राम सभा के नेतृत्व में ग्रामीणों ने अपने जंगल की सीमाओं को चिन्हित करने के लिए पेड़ों पर नीले रंग के निशान लगाए हैं। ये निशान केवल सीमांकन नहीं, बल्कि एकता, पहचान और संरक्षण के प्रतीक बन चुके हैं।

इस पहल की शुरुआत 2025 में हुई, जब गाँव में वन उपयोग को लेकर पड़ोसी क्षेत्रों के साथ विवाद सामने आए। स्पष्ट सीमाओं के अभाव में समस्याएं बढ़ रही थीं। ऐसे में सरकारी हस्तक्षेप का इंतजार करने के बजाय, ग्राम सभा ने स्वयं आगे बढ़कर पारंपरिक सीमाओं को चिन्हित करने का निर्णय लिया और एक सहभागी प्रक्रिया के तहत पेड़ों पर नीले रंग से सीमांकन किया।

नीला रंग शांति, सुरक्षा और जिम्मेदारी का प्रतीक माना गया। पूरे गाँव ने मिलकर इस कार्य को अंजाम दिया—महिलाएं, पुरुष और युवा सभी ने जंगल के रास्तों पर चलते हुए पेड़ों पर सावधानीपूर्वक निशान लगाए। यह प्रक्रिया न केवल सीमाओं को स्पष्ट करती है, बल्कि समुदाय के भीतर जिम्मेदारी और स्वामित्व की भावना को भी मजबूत करती है।

यह पहल केवल सीमांकन तक सीमित नहीं है, बल्कि स्वशासन की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम है। ग्राम सभा ने संसाधनों के प्रबंधन के लिए नियम बनाए हैं—जैसे मौसमी संग्रहण, नियंत्रित चराई, वन अग्नि से सुरक्षा और पारंपरिक मान्यताओं का पालन। यह सब मिलकर सतत वन प्रबंधन का एक सशक्त उदाहरण प्रस्तुत करता है।

रंजारा की यह पहल अब अन्य गांवों के लिए प्रेरणा बन रही है। यह साबित करती है कि जब समुदाय अपने अधिकारों के प्रति जागरूक और संगठित होते हैं, तो वे न केवल संसाधनों की रक्षा कर सकते हैं, बल्कि उन्हें संतुलित और टिकाऊ तरीके से प्रबंधित भी कर सकते हैं।

यह कहानी बताती है कि प्रकृति की रक्षा का असली बल समुदायों की एकजुटता और उनकी प्रतिबद्धता में छिपा है।

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