कारवी यादव : कभी-कभी एक छोटा सा संकल्प हजारों जिंदगियों की दिशा बदल देता है। ऐसा ही एक प्रेरणादायक उदाहरण है ‘सेंट जूड इंडिया चाइल्डकेयर सेंटर्स’, जहां एक दंपत्ति के प्रयासों ने अब तक लगभग 6000 वंचित बच्चों को कैंसर जैसी गंभीर बीमारी से लड़ने के लिए निःशुल्क सहारा दिया है। यह सिर्फ इलाज नहीं, बल्कि उम्मीद और भरोसे की एक ऐसी पहल है, जिसने अनगिनत परिवारों को टूटने से बचाया है।

इस पहल की शुरुआत साल 2006 में निहाल कविरात्ने और उनकी पत्नी श्यामा ने की थी। मुंबई के टाटा मेमोरियल अस्पताल के बाहर फुटपाथों पर इलाज के लिए आए मरीजों और उनके परिजनों की पीड़ा देखकर उन्होंने यह ठान लिया कि कोई भी बच्चा सिर्फ संसाधनों की कमी के कारण इलाज से वंचित न रहे। यहीं से ‘सेंट जूड’ की नींव पड़ी, जो आज देश के कई शहरों में फैल चुका है।

सेंट जूड केंद्रों की सबसे बड़ी खासियत यह है कि यहां कैंसर से जूझ रहे बच्चों और उनके परिवारों को सिर्फ रहने की जगह ही नहीं, बल्कि एक सुरक्षित और घर जैसा वातावरण दिया जाता है। मुफ्त आवास, पौष्टिक भोजन, स्वच्छता, अस्पताल तक आने-जाने की सुविधा, काउंसलिंग और बच्चों की शिक्षा—इन सभी पहलुओं का समग्र ध्यान रखा जाता है, ताकि इलाज के दौरान किसी भी तरह की कमी महसूस न हो।

त्रिपुरा के छोटे से शहर से आए पांच वर्षीय राजिब मलाकर की कहानी भी इसी बदलाव की गवाह है। आर्थिक तंगी के कारण परिवार इलाज बीच में छोड़ने की स्थिति में था, लेकिन सेंट जूड से जुड़ने के बाद उन्हें न सिर्फ रहने और खाने की सुविधा मिली, बल्कि अपने बच्चे के बेहतर इलाज और देखभाल का भरोसा भी मिला।

आज राजिब स्वस्थ होने की राह पर है और उसका परिवार एक नई उम्मीद के साथ आगे बढ़ रहा है। संगठन के सीईओ अनिल नायर के अनुसार, इन केंद्रों ने इलाज छोड़ने की दर को 30% से घटाकर 5% से भी कम करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। यह उपलब्धि इसलिए संभव हो सकी क्योंकि सेंट जूड अस्पतालों के साथ मिलकर बच्चों और उनके परिवारों की पोषण, मानसिक और भावनात्मक जरूरतों को भी उतनी ही गंभीरता से पूरा करता है जितना चिकित्सा उपचार को।

सेंट जूड की कहानी यहीं खत्म नहीं होती। ‘सेंट जूड्स फॉर लाइफ’ पहल के माध्यम से यह संस्था इलाज के बाद भी बच्चों का साथ नहीं छोड़ती, बल्कि उनकी शिक्षा, करियर और स्वास्थ्य में निरंतर सहयोग देती है। यही वजह है कि यह पहल सिर्फ एक सेवा नहीं, बल्कि एक ऐसा मिशन बन चुकी है, जो हर बच्चे को यह भरोसा दिलाती है—“मुश्किलें चाहे कितनी भी हों, जिंदगी फिर से मुस्कुरा सकती है।”

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