- Post by Admin on Wednesday, Aug 12, 2026
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रजनी जोशी: छत्तीसगढ़ की धरती को धान का कटोरा कहा जाता है, और यहाँ के पर्व-त्योहारों की शुरुआत भी खेती-किसानी से ही होती है। सावन महीने की अमावस्या के दिन मनाया जाने वाला हरेली छत्तीसगढ़ के लोक-जीवन का पहला त्योहार माना जाता है। इस दिन किसान अपने खेतों में हरियाली की शुरुआत का उत्सव मनाते हैं। बारिश के बाद जब धान की फसल हरी-भरी होने लगती है, तो किसानों के मन में एक नई उमंग जाग उठती है, और यही उमंग हरेली पर्व के रूप में सामने आती है।
हरेली के दिन गाँव-गाँव में एक अनोखा नजारा देखने को मिलता है। किसान अपने हल, कुदाल, नागर, गैंती जैसे कृषि उपकरणों को साफ-सुथरा करके उनकी पूजा करते हैं, क्योंकि यही औजार साल भर उनकी मेहनत के साथी होते हैं। घरों के मुख्य द्वार पर नीम की पत्तियाँ बाँधी जाती हैं, जिससे बुरी नजर और बीमारियों से बचाव माना जाता है। पशुओं, विशेषकर बैलों और गायों को भी इस दिन विशेष स्नेह दिया जाता है, उन्हें नमक और गुड़ खिलाया जाता है, क्योंकि खेती में उनका योगदान किसान कभी नहीं भूलते।
गाँव की महिलाएँ इस दिन घरों में तरह-तरह के पारंपरिक पकवान बनाती हैं। चीले, ठेठरी, खुरमी जैसे व्यंजनों की खुशबू हर आँगन से उठती है। बच्चों के लिए हरेली सबसे प्रिय त्योहारों में से एक है, क्योंकि इसी दिन "गेड़ी" चढ़ने की परंपरा निभाई जाती है। बाँस से बनी गेड़ी पर चढ़कर गाँव की गलियों में घूमना बच्चों और युवाओं के लिए बड़ा रोमांच होता है, और कई गाँवों में गेड़ी दौड़ प्रतियोगिताएँ भी आयोजित होती हैं।
इस पर्व का एक और महत्वपूर्ण पहलू है सामूहिकता और भाईचारा। हरेली के दिन गाँव के लोग एक-दूसरे के घर जाकर बधाई देते हैं, पुरानी रंजिशें भुला दी जाती हैं। कई गाँवों में इस दिन कुश्ती, गिल्ली-डंडा जैसे पारंपरिक खेल भी आयोजित किए जाते हैं। आज के दौर में जब गाँव भी शहरीकरण की चपेट में आ रहे हैं, हरेली जैसे त्योहार छत्तीसगढ़ की पहचान को जीवित रखने का काम करते हैं।
यह पर्व प्रकृति, पशुधन और मेहनतकश किसानों के प्रति आभार व्यक्त करने का माध्यम है। सत्यदर्शन लाइव की टीम मानती है कि इस तरह के लोक-पर्वों को संजोए रखना न केवल छत्तीसगढ़ की संस्कृति के लिए, बल्कि आने वाली पीढ़ियों को अपनी जड़ों से जोड़े रखने के लिए भी बेहद जरूरी है।
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