- Post by Admin on Tuesday, Mar 03, 2026
- 193 Viewed
![]()
रजनी यादव :पलाश के रंग-बिरंगे फूल इस समय जंगल और खेतों की शोभा बढ़ा रहे हैं. छत्तीसगढ़ में भी पलाश के पेड़ काफी ज्यादा पाए जाते हैं. जंगल तो छोड़िए खेतों की मेढ़ों के ऊपर भी ये पलाश के पेड़ मिल जाएंगे. पलाश की खूबसूरती ऐसी कि वहां अनायास ही ठहरने का मन कर जाए. लेकिन क्या आपको पता है जिस पलाश के पेड़ को क्षेत्र के लोग व्यर्थ मानते हैं वही पलाश का पेड़ पैसों की बारिश कर सकता है. जानकारों की मानें तो ये कीमती पेड़ों में से एक है जो प्रकृति का अनमोल तोहफा है.
पलाश के पेड़ को कहते हैं 'फायर ऑफ द जंगल' कृषि वैज्ञानिक के अनुसार "पलाश के पेड़ को फायर ऑफ द जंगल भी कहते हैं. जब जंगल में बहुतायत में पलाश के फूल खिले होते हैं तो वहां ऐसा लगता है मानो आग लगी हो. इसलिए इसे फायर ऑफ द जंगल के नाम से भी जाना जाता है. पलाश को टेसू, ढाक, परसा, केसू और किंशुक जैसे नामों से जाना जाता है। बसंत ऋतु में इसके पुष्प गुच्छ अंगारों की तरह दहकते है और गिरे फूलों से धरती लाल चादर-सी ओढ़ लेती है। अंग्रेजी साहित्य में इसे ‘फ्लेम ऑफ फॉरेस्ट’ यानी ‘वन ज्योति’ कहा गया है
किसानों का मित्र है ये पेड़ कभी आपने इसके बारे में सोचा ना होगा कि आखिर खेतों की मेड़ों पर पलाश के पेड़ क्यों लगाए जाते हैं. उसकी मुख्य वजह ये है कि पलाश के पेड़ किसानों के मित्र का भी काम करता है. ये पेड़ बायोमास का काम करते हैं, मतलब मिट्टी को उपजाऊ बनाते हैं उसमें नाइट्रोजन बढ़ाते हैं. इसके अलावा इसके फूलों से गुलाल बनाने का भी काम किया जाता है. इसके साथ ही इसमें लाख बनता हैं. लाख का व्यावसायिक उपयोग भी है. इस पेड़ की एक खासियत यह है कि जब खेतों की मेड़ पर लगा होता है तो इसकी छांव नहीं बनती है. जब इस पेड़ के पत्ते झड़ते हैं तो आपके खेतों के लिए खाद का काम भी करता है.
पेड़ नहीं वरदान है पलाश का पेड़ आयुर्वेद डॉक्टर बताते हैं कि "पलाश का बॉटनिकल नेम ब्यूटिया मोनोस्पर्मा है. इस पेड़ का औषधीय महत्व बहुत ज्यादा है. अगर इसके बीज की बात की जाए इसके बीच का चूर्ण कृमि हर होता है, कृमि हर दोनों तरह से होता है. पेट के कीड़ों को मार करके निकालता है और यदि इसके सरसों के तेल के साथ इसके चूर्ण का लेप किया जाए तो फंगल डिजीज और बैक्टीरियल डिजीज को भी ठीक करने का पोटेंशियल रखता है. इसकी छाल का काढ़ा गायनोलॉजिकल प्रॉब्लम जैसे मिनो रेजिया मेट्रो रेजिया में काफी उपयोगी होता है. इससे निकलने वाली गोंद का भी कई प्रकार से व्यवसायिक उपयोग है. लोग अच्छी कमाई कर सकते हैं."
अन्य समाचार
बिना बनावट और दिखावे के, ट्रक ड्राइवर राजेश रवानी ने साबित कर दिया कि साधारण दिनचर्या भी असाधारण बन सकती है, अगर उसमें मेहनत, सादगी और दिल से किया गया प्रयास शामिल हो
झारखंड के रहने वाले Rajesh Ravani आज सोशल मीडिया पर किसी सेलिब्रिटी से कम नहीं हैं। सड़क किनारे सरल तरीके से खाना बनाते उनके वीडियो ने उन्हें 27 लाख से अधिक सब्सक्राइबर दिलाए हैं और वे डिजिटल दुनिया में एक अलग पहचान बना चुके हैं।
Read More...
जब ‘मैं’ नहीं रहा, सिर्फ ‘हम’ बचा....प्यार सिर्फ मीठी बातों तक सीमित नहीं होता..दो जीवनसाथियों के एक-दूसरे के लिए बलिदान में भी झलकता है
Valentine Day Love Story: सविता और भरत की प्रेम कहानी एक सच्चे बलिदान की कहानी है। भरत का लिवर खराब होने पर सविता ने अपनी जान की परवाह किए बिना उन्हें अपना लिवर डोनेट किया। इस कदम ने उनके वैलंटाइंस डे को हमेशा के लिए खास बना दिया।
Read More...
Vidushi Diksha: 216 घंटे लगातार भरतनाट्यम कर बनाया विश्व रिकॉर्ड
Who Is Vidushi Diksha: भारत के नाम कई उपलब्धियां हैं, उन्हीं में से एक है, भारतीय शास्त्रीय नृत्य भरतनाट्यम का प्रदर्शन सबसे लंबे समय तक करना। कर्नाटक की बेटी विदुषी दीक्षा ने 216 घंटे नृत्य करके ये रिकॉर्ड बनाया है।
Read More...
छोटे गांव बड़े बदलाव...पेड़ लगाकर, सौर ऊर्जा अपनाकर और ग्रामीणों को साथ लेकर,महिला सरपंच ने बदली गांव की तस्वीर
महिलाओं की भागीदारी, सामूहिक निर्णय और पर्यावरण संरक्षण ने इस गांव को नई पहचान दी है। कई विश्वसनीय मंचों ने भी दाव्वा के इस परिवर्तन को देश के सामने रखा है। आज दाव्वा न सिर्फ एक गांव है, बल्कि यह उम्मीद, स्थिरता और जिम्मेदार नेतृत्व की मिसाल बन चुका है।
Read More...
गत्ते के रॉकेट से गामा किरणों तक: दो छात्रों की असाधारण उड़ान
पश्चिम बंगाल के दुर्गापुर निवासी महज 21 वर्षीय स्नेहदीप कुमार और भुवनेश्वर के छात्र मोहित कुमार नायक ने साबित कर दिया कि अगर इरादे मजबूत हों, तो सीमित संसाधन भी असीम संभावनाओं में बदल सकते हैं।
Read More...
परिवर्तन के साथ चलना ज़रूरी है, लेकिन अपनी पहचान खोकर नहीं...गहनों में सजी संस्कृति, परंपरा को संवारती शुभा कलाकृति
छत्तीसगढ़ की महिलाएँ मेहनतकश हैं, उनके हाथों में पसीने की चमक है और आभूषणों में आत्मसम्मान की झलक। पारंपरिक गहने केवल सजावट नहीं, बल्कि सामाजिक और सांस्कृतिक प्रतीक रहे हैं। मगर यह भी सत्य है कि जिस चीज़ का उपयोग कम होने लगता है, वह धीरे-धीरे विलुप्ति की ओर बढ़ती है। आधुनिकता की तेज़ रफ्तार और बदलते फैशन ने इन पारंपरिक गहनों को भी हाशिए पर ला खड़ा किया।
Read More...
15 हजार घोंसलों से लौटी चहचहाहट: सामूहिक प्रयासों ने लौटाई गौरैयों की दुनिया
चेन्नई में एक व्यक्ति की पहल अब शहरी संरक्षण की मिसाल बन चुकी है। महज़ एक साल पहले लगाए गए 15,000 घोंसले के बक्सों के बाद, शहर में गौरैया फिर से दिखाई देने लगी हैं।
Read More...
आत्मनिर्भरता की राह : नाबार्ड के ग्रामीण भारत महोत्सव में रुचि महिला मंडल की सशक्त मौजूदगी
राष्ट्रीय कृषि और ग्रामीण विकास बैंक (नाबार्ड) द्वारा आयोजित यह 10 दिवसीय ग्रामीण भारत महोत्सव 19 दिसंबर से 28 दिसंबर 2025 तक गांधी मैदान, पटना में आयोजित किया गया। देश के विभिन्न राज्यों से आए स्व-सहायता समूहों, महिला मंडलों और ग्रामीण उद्यमियों ने अपने उत्पादों के माध्यम से ग्रामीण भारत की रचनात्मकता और आत्मनिर्भरता का सशक्त परिचय दिया।
Read More...
NHAI: एनएच-45 पर भारत की पहली वाइल्डलाइफ-सेफ सड़क, विकास और संरक्षण का नया मॉडल
सड़क विकास और संरक्षण के बीच संतुलन बनाने के मकसद से अपनी तरह की पहली पहल में, नेशनल हाईवे अथॉरिटी ऑफ इंडिया (NHAI) ने मध्य प्रदेश में नेशनल हाईवे 45 के एक अहम हिस्से पर इनोवेटिव 'टेबल-टॉप रेड रोड मार्किंग' शुरू की है।
Read More...
कर्मयोगी....एयर इंडिया ने 35 हजार फीट की ऊंचाई पर हेलमेट मैन ऑफ़ इंडिया’ को किया सम्मानित
हेलमेट मैन ऑफ इंडिया राघवेंद्र कुमार ने, एक सड़क हादसे में अपने खास मित्र को खोने के बाद विक्टिम बनकर विलुप्त रहकर जीना स्वीकार नहीं किया. बल्कि पिछले 12 वर्षों से हर दिन सड़कों पर दुर्घटनाओं के खिलाफ जागरूकता की लड़ाई लड़ रहे हैं.
Read More...