सत्यदर्शन लाइव डेस्क : चेन्नई में एक व्यक्ति की पहल अब शहरी संरक्षण की मिसाल बन चुकी है। महज़ एक साल पहले लगाए गए 15,000 घोंसले के बक्सों के बाद, शहर में गौरैया फिर से दिखाई देने लगी हैं। यह परिवर्तन कूडुगल नेस्ट ट्रस्ट की पहल का परिणाम है, जिसने न सिर्फ गौरैयों की घटती आबादी को संबल दिया, बल्कि समुदायों और स्कूलों को भी इस अभियान से जोड़ा।

पिछले एक वर्ष में कूडुगल ने शहरी जैव विविधता संरक्षण के क्षेत्र में उल्लेखनीय काम किया है। ट्रस्ट के संस्थापक गणेशन के अनुसार, तमिलनाडु भर के स्कूली बच्चों को लगभग 15,000 घोंसले के बक्से वितरित किए गए। ये बक्से एक ओर गौरैयों को सुरक्षित प्रजनन स्थल उपलब्ध कराते हैं, वहीं दूसरी ओर बच्चों के लिए पर्यावरण शिक्षा की जीवंत कक्षा बन गए हैं।

इस पहल का दायरा अब चेन्नई तक सीमित नहीं रहा। राज्य के 10 अतिरिक्त जिलों तक इसका विस्तार हो चुका है। खास तौर पर उत्तरी चेन्नई में गौरैयों की आबादी में लगभग 30 प्रतिशत की वृद्धि दर्ज की गई है। गणेशन कहते हैं, “गलियों, बालकनियों और स्कूल के मैदानों में गौरैयों को लौटते देखना हमारे लिए बेहद संतोषजनक है। यह बताता है कि छोटे प्रयास भी बड़ा बदलाव ला सकते हैं।”

समुदाय और स्कूल बने संरक्षण के साझेदार: कूडुगल के मॉडल की खासियत शिक्षा और सामुदायिक सहभागिता है। स्कूल कार्यक्रमों को व्यावहारिक संरक्षण गतिविधियों से जोड़कर ट्रस्ट ने शहरी जैव विविधता संरक्षण का एक अनुकरणीय ढांचा तैयार किया है। बच्चे न केवल गौरैयों की देखभाल करना सीख रहे हैं, बल्कि पर्यावरण के प्रति अपनी जिम्मेदारी को भी समझ रहे हैं। प्रौद्योगिकी को भी इस अभियान से जोड़ा गया है। जैव विविधता निगरानी के लिए मोबाइल एप्लिकेशन विकसित किए जा रहे हैं, जिनकी मदद से छात्र, स्वयंसेवक और नागरिक गौरैयों की संख्या दर्ज कर सकते हैं। इससे अनुसंधान के लिए महत्वपूर्ण डेटा उपलब्ध हो रहा है।

राष्ट्रीय-अंतरराष्ट्रीय पहचान और शोध समर्थन: कूडुगल के कार्यों को देश-विदेश में सराहना मिली है। ट्रस्ट को 31 मार्च से 2 अप्रैल 2026 तक ब्रिटेन के नॉटिंघम विश्वविद्यालय में ब्रिटिश ऑर्निथोलॉजिस्ट्स यूनियन द्वारा आयोजित सम्मेलन में अपनी संरक्षण पहल प्रस्तुत करने के लिए आमंत्रित किया गया है।भारत के प्रधानमंत्री से मिली मान्यता और विभिन्न कॉर्पोरेट संस्थाओं चेन्नई विलिंगडन कॉर्पोरेट फाउंडेशन, जेनेसिस, सर्वेस्पैरो प्राइवेट लिमिटेड और लेनोक्स इंडिया टेक्नोलॉजी के सहयोग से ट्रस्ट को अपने कार्यक्रमों का विस्तार करने में बल मिला है। अनुसंधान ने भी कूडुगल के प्रयासों को वैज्ञानिक आधार दिया है। बायोट्रोपिका पत्रिका (खंड 57, अंक 6, 11 नवंबर 2025) में प्रकाशित शोध में शहरी गौरैयों की चुनौतियों और घोंसले के बक्सों जैसे उपायों की अहमियत को रेखांकित किया गया है।

भविष्य की ओर उम्मीद : बीते एक साल में उत्तरी चेन्नई में गौरैया फिर से नियमित रूप से दिखने लगी हैं, सामुदायिक भागीदारी बढ़ी है और शहरी जैव विविधता को लेकर जागरूकता फैली है। गणेशन और उनकी टीम को भरोसा है कि बढ़ते नेटवर्क और जनसहयोग के साथ कूडुगल न केवल चेन्नई, बल्कि अन्य शहरों को भी ऐसा स्थान बनाएगा जहाँ गौरैयों का सम्मान होगा और उनकी चहचहाहट फिर से शहरों की पहचान बनेगी।

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