सत्यदर्शन लाइव :बचपन में तारों की ओर देख कर देखे गए सपने अक्सर जिम्मेदारियों के बोझ तले दब जाते हैं, लेकिन कुछ सपने ऐसे होते हैं जो जिद बन जाते हैं। पश्चिम बंगाल के दुर्गापुर निवासी महज 21 वर्षीय स्नेहदीप कुमार और भुवनेश्वर के छात्र मोहित कुमार नायक ने साबित कर दिया कि अगर इरादे मजबूत हों, तो सीमित संसाधन भी असीम संभावनाओं में बदल सकते हैं। ये दोनों युवा आज भारत के पहले छात्र-निर्मित गामा-किरण डिटेक्शन क्यूबसैट के जरिए अंतरिक्ष को आम लोगों और छात्रों के करीब लाने की दिशा में ऐतिहासिक कदम बढ़ा रहे हैं।

गौरतलब है कि, स्नेहदीप की अंतरिक्ष यात्रा की शुरुआत बचपन में हुई, जब उनके पिता ने उन्हें एक विश्वकोश दिया और डिस्कवरी चैनल से परिचित कराया। अंतरिक्ष का रहस्य, तारों की अनंतता और ब्रह्मांड के सवाल उनके मन में बस गए। यही जिज्ञासा आगे चलकर विज्ञान प्रदर्शनी, शोध और फिर एक ऐसे मंच के निर्माण का कारण बनी, जहां स्कूल और कॉलेज के छात्र भी अपने वैज्ञानिक विचार दुनिया के सामने रख सकें।

इसी सोच से जन्म हुआ ‘ऑरोरा एकेडमी जर्नल’ का, जिसने 15 देशों के 40 से अधिक युवाओं को जोड़ते हुए एक वैश्विक वैज्ञानिक आंदोलन का रूप ले लिया। नोबेल पुरस्कार विजेताओं तक से संवाद और साक्षात्कार इस पहल की गंभीरता को दर्शाते हैं। लेकिन स्नेहदीप यहीं नहीं रुके। 2021 में उन्होंने महसूस किया कि अंतरिक्ष अनुसंधान अत्यधिक महंगा और सीमित लोगों तक सिमटा हुआ है। इसी सोच से ‘नेबुला स्पेस ऑर्गनाइजेशन’ की नींव रखी गई।

कॉलेज में स्नेहदीप की मुलाकात मोहित कुमार नायक से हुई, जिनके सपने भी अंतरिक्ष जितने ही विशाल थे। सीमित टीम और आर्थिक चुनौतियों के बावजूद दोनों ने क्यूबसैट निर्माण पर काम शुरू किया। उन्होंने महंगे एयरोस्पेस पुर्जों की जगह स्थानीय संसाधनों और स्वदेशी तकनीक का उपयोग कर लागत को आश्चर्यजनक रूप से कम किया। यही आत्मनिर्भरता उनकी सबसे बड़ी ताकत बनी। नेबुला स्पेस के क्यूबसैट सिर्फ वैज्ञानिक खोज तक सीमित नहीं हैं, बल्कि पर्यावरण के प्रति भी जिम्मेदार हैं।

अंतरिक्ष मलबे की बढ़ती समस्या को देखते हुए टीम ने ऐसे उपग्रह डिजाइन किए हैं, जो मिशन पूरा होने के बाद सुरक्षित रूप से वायुमंडल में लौटकर नष्ट हो जाएंगे। सोलर सेल, GNSS ट्रैकिंग और ऐप-आधारित निगरानी जैसी तकनीकें इस नवाचार को और भी खास बनाती हैं।

दो साल के गहन शोध के बाद नेबुला स्पेस का प्रोटोटाइप अंतरराष्ट्रीय मंच पर पहचान बना चुका है। इंटरनेशनल एस्ट्रोनॉटिकल कांग्रेस 2024 में उनका शोध स्वीकार किया जाना इस बात का प्रमाण है कि भारतीय युवा वैश्विक अंतरिक्ष मानचित्र पर अपनी जगह बना सकते हैं। फंडिंग की चुनौती के बावजूद स्नेहदीप और मोहित का लक्ष्य स्पष्ट है अंतरिक्ष अनुसंधान को छात्रों और विकासशील देशों के लिए सुलभ बनाना। उनकी यह उड़ान न केवल सितारों तक पहुंचने की कोशिश है, बल्कि उन अनगिनत सपनों के लिए भी रास्ता है, जो अब तक जमीन पर ही रह गए थे।

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