रजनी : मजबूत इरादे, सामूहिक भागीदारी और प्रकृति के प्रति जिम्मेदारी अगर एक साथ आ जाए, तो कोई भी गांव मिसाल बन सकता है। महाराष्ट्र के गोंडिया जिले का दाव्वा गांव आज इसी सोच का जीवंत उदाहरण है, जहां एक महिला सरपंच योगेश्वरी चतुर्गन चौधरी ने 1,16,000 पेड़ लगाकर, सौर ऊर्जा अपनाकर और ग्रामीणों को साथ लेकर गांव का कायाकल्प कर दिया।

गौरतलब है कि, सड़क अर्जुनी तालुका में स्थित दाव्वा गांव ने वर्ष 2025 में जलवायु कार्रवाई विशेष पंचायत पुरस्कार (CASPA) जीतकर देशभर में पहचान बनाई। यह पुरस्कार पाने वाला दाव्वा भारत का पहला गांव बना, जिसे जमीनी स्तर पर जलवायु कार्यों के लिए 1 करोड़ रुपये की राशि मिली। इससे पहले दिसंबर 2023 से जून 2024 तक गांव को संत गाडगे बाबा पुरस्कार और माझी वसुंधरा पुरस्कार जैसे कई राज्य स्तरीय सम्मान मिले, जिनकी कुल राशि 1.61 करोड़ रुपये है।

ज्ञात हो कि, योगेश्वरी चतुर्गन चौधरी का सफर आसान नहीं रहा। बारहवीं तक पढ़ी योगेश्वरी शादी के बाद दाव्वा आईं, आगे पढ़ाई कर शिक्षिका बनीं, लेकिन 2017 में पति के निधन के बाद उन्होंने अकेले ही बच्चे की परवरिश की। गांव की बिगड़ती हालत मिट्टी का क्षरण, खेती में नुकसान और युवाओं का पलायन ने उन्हें राजनीति में आने के लिए प्रेरित किया। दिसंबर 2023 में वे दाव्वा की पहली महिला सरपंच बनीं और गांव के विकास को अपना मिशन बना लिया।

सरपंच बनने के बाद उन्होंने सौर ऊर्जा आधारित सिंचाई, टिकाऊ खेती और महिला स्वयं सहायता समूहों को मजबूत किया। आज गांव में धान की पैदावार बढ़ी है, फलों के बाग फल-फूल रहे हैं और पशुधन की संख्या में भी इजाफा हुआ है। स्कूल, सार्वजनिक भवन और कई घर सौर ऊर्जा से रोशन हैं। गांव में कचरा प्रबंधन, प्लास्टिक प्रतिबंध और इलेक्ट्रिक वाहनों से कचरा संग्रह जैसे कदम भी उठाए गए हैं।

दाव्वा गांव की यह कहानी साबित करती है कि छोटे गांव भी बड़े बदलाव की शुरुआत कर सकते हैं। महिलाओं की भागीदारी, सामूहिक निर्णय और पर्यावरण संरक्षण ने इस गांव को नई पहचान दी है। कई विश्वसनीय मंचों ने भी दाव्वा के इस परिवर्तन को देश के सामने रखा है। आज दाव्वा न सिर्फ एक गांव है, बल्कि यह उम्मीद, स्थिरता और जिम्मेदार नेतृत्व की मिसाल बन चुका है।

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