महाराष्ट्र के Sindhudurg district में बसा छोटा-सा गांव निवाजे आज पूरे देश के लिए प्रेरणा बन चुका है। लगभग 48 प्रतिशत जंगलों से घिरे इस गांव में कभी लोग खाना पकाने के लिए जंगलों से लकड़ियां लाते थे। धुएं से भरे रसोईघर, महिलाओं की आंखों में जलन और जंगलों पर बढ़ता दबाव यहां की सामान्य तस्वीर थी। लेकिन आज यही गांव राज्य का पहला कार्बन न्यूट्रल गांव बनने की दिशा में तेजी से आगे बढ़ रहा है।

गांव की सरपंच वैष्णवी पालाव बताती हैं कि अब निवाजे के लोग न तो जलाऊ लकड़ी पर निर्भर हैं और न ही महंगे एलपीजी सिलेंडरों पर। पिछले एक दशक में लगभग 350 परिवारों वाले इस गांव ने अपनी जीवनशैली बदलकर कार्बन उत्सर्जन को काफी कम कर दिया है। ग्रामीण अब रासायनिक खादों का उपयोग नहीं करते, बल्कि बायोगैस से निकलने वाली स्लरी को जैविक खाद के रूप में इस्तेमाल करते हैं। इसके साथ ही गांव में बड़ी संख्या में बांस लगाए गए हैं, जो वातावरण से कार्बन डाइऑक्साइड को अवशोषित करने में बेहद प्रभावी माने जाते हैं।

इस परिवर्तन के पीछे सबसे बड़ी भूमिका Bhagirath Gramvikas Pratishthan की रही है, जिसे आयुर्वेद चिकित्सक दंपति डॉ. प्रसाद देवधर और डॉ. हर्षदा देवधर संचालित करते हैं। वर्ष 2004 से यह संस्था सिंधुदुर्ग के गांवों में काम कर रही है। जब उन्होंने पहली बार निवाजे का दौरा किया, तब गांव में कुपोषण, बेरोजगारी और जंगलों पर अत्यधिक निर्भरता जैसी समस्याएं थीं। उन्होंने ग्रामीणों को पर्यावरण संरक्षण के साथ-साथ टिकाऊ जीवनशैली अपनाने के लिए प्रेरित किया और घरों के पिछवाड़े में बायोगैस यूनिट लगाने की पहल शुरू की।

साल 2012 में गांव की पहली बायोगैस इकाई किसान दत्तात्रेय सावंत के घर में स्थापित की गई। धीरे-धीरे यह पहल पूरे गांव में फैल गई और आज यहां 140 सक्रिय बायोगैस इकाइयां कार्यरत हैं। गोबर, सब्जियों के कचरे और अन्य जैविक अपशिष्टों से बनने वाली यह गैस खाना पकाने के लिए पर्याप्त ईंधन देती है। इससे महिलाओं को धुएं से मुक्ति मिली, समय की बचत हुई और वे स्वयं सहायता समूहों के माध्यम से सिलाई, पापड़ और अचार निर्माण जैसे अतिरिक्त रोजगार से जुड़ सकीं। इतना ही नहीं, बायोगैस से निकलने वाली स्लरी खेतों के लिए उत्कृष्ट जैविक खाद बन गई, जिससे किसानों ने रासायनिक उर्वरकों का उपयोग लगभग बंद कर दिया।

पर्यावरणीय दृष्टि से भी निवाजे का बदलाव बेहद महत्वपूर्ण है। भारतीय कृषि अनुसंधान संस्थान और अंतर्राष्ट्रीय चावल अनुसंधान संस्थान के अध्ययन के अनुसार, यहां का एक बायोगैस संयंत्र हर वर्ष हजारों किलो जलाऊ लकड़ी और गोबर के उपलों की आवश्यकता को समाप्त करता है तथा कार्बन मोनोऑक्साइड, सल्फर डाइऑक्साइड और नाइट्रोजन ऑक्साइड जैसे प्रदूषक गैसों के उत्सर्जन को काफी कम करता है। इसके साथ ही ग्रामीणों ने खेतों के किनारों पर बांस लगाकर हरित अर्थव्यवस्था की नई राह बनाई है।

आज गांव बांस के खंभों की बिक्री से लगभग 45 लाख रुपये सालाना कमा रहा है। निवाजे के किसानों ने एसआरआई पद्धति से धान उत्पादन को दोगुना कर दिया है और गांव अब खाद्यान्न के मामले में आत्मनिर्भर बन चुका है। कभी जहां सार्वजनिक वितरण प्रणाली की दुकानों पर लंबी कतारें लगती थीं, वहीं आज ग्रामीण व्यापारीयों को चावल बेच रहे हैं। यह गांव केवल पर्यावरण संरक्षण की मिसाल नहीं, बल्कि आत्मनिर्भरता, सामुदायिक भागीदारी और सतत विकास का जीवंत उदाहरण बन चुका है। निवाजे साबित करता है कि यदि गांव प्रकृति के साथ संतुलन बनाकर आगे बढ़ें, तो विकास और पर्यावरण संरक्षण साथ-साथ चल सकते हैं।

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