- Post by Admin on Saturday, May 16, 2026
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कारवी यादव : तेज धूप, भागती सड़कें और लोगों की व्यस्त जिंदगी के बीच जब अचानक डफली की मधुर थाप गूंजने लगी, तो हर कोई ठिठककर देखने लगा। छत्तीसगढ़ के दल्ली राजहरा निवासी वीरेंद्र सिंह अपने साथियों के साथ हाथों में सीड बॉल लिए लोगों से एक ही निवेदन कर रहे थे “अगर पेड़ नहीं बचेंगे, तो आने वाली पीढ़ियों की सांसें भी सुरक्षित नहीं रहेंगी।” उनकी आवाज में चिंता भी थी और उम्मीद भी।
गौरतलब है कि युवाओं ने मिलकर लगभग 500 सीड बॉल तैयार किए, जिनमें गुलमोहर और अमलतास जैसे सुंदर एवं पर्यावरण के लिए उपयोगी वृक्षों के बीज शामिल थे। वे शहर की सड़कों, चौक-चौराहों और सार्वजनिक स्थानों पर पहुंचकर लोगों को ये सीड बॉल वितरित करते रहे। राहगीरों को समझाया गया कि इन बीजों को सूखी या खाली जमीन, जंगलों और आसपास के क्षेत्रों में फेंक दें, ताकि बारिश के साथ ये अंकुरित होकर पेड़ों का रूप ले सकें।
इस पूरी मुहिम की सबसे खास बात थी इसका अनोखा तरीका। डफली बजाकर गीत और संदेश के माध्यम से लोगों को जागरूक किया गया। जैसे ही डफली की आवाज गूंजती, लोग उत्सुकता से रुक जाते और फिर पर्यावरण संरक्षण की इस अनूठी पहल से जुड़ते चले जाते। बच्चों से लेकर बुजुर्गों तक हर किसी के चेहरे पर उत्साह दिखाई दे रहा था। कई लोगों ने तुरंत अपने हाथों से बीज लेकर उन्हें सुरक्षित स्थानों तक पहुंचाने का संकल्प भी लिया।
वीरेंद्र सिंह और उनके साथियों का मानना है कि सिर्फ सरकार के भरोसे पर्यावरण नहीं बचाया जा सकता। समाज के प्रत्येक व्यक्ति को अपनी जिम्मेदारी समझनी होगी। इसी सोच के साथ उन्होंने लोगों से आम खाने के बाद उसके बीजों को फेंकने की बजाय जंगलों या खाली जमीनों में डालने की अपील की। उनका कहना है कि एक छोटा-सा बीज भविष्य में हजारों लोगों को छांव, ऑक्सीजन और जीवन दे सकता है।
पर्यावरण संरक्षण को लेकर आज जहां बड़ी-बड़ी चर्चाएं होती हैं, वहीं इन युवाओं ने बिना किसी दिखावे के जमीन पर उतरकर एक प्रेरणादायक उदाहरण प्रस्तुत किया है। सीड बॉल जैसी छोटी पहल आने वाले समय में बड़े बदलाव की वजह बन सकती है। यदि हर व्यक्ति वर्ष में केवल कुछ बीज भी प्रकृति को लौटा दे, तो धरती का हरापन फिर से लौट सकता है।
यह पहल केवल पेड़ लगाने तक सीमित नहीं है, बल्कि यह समाज को प्रकृति से जोड़ने का भावनात्मक प्रयास भी है। वीरेंद्र सिंह और उसके साथियों ने यह साबित कर दिया कि बदलाव लाने के लिए बड़े मंच नहीं, बल्कि बड़ा इरादा चाहिए। डफली की थाप के साथ बोए गए ये बीज आने वाले वर्षों में न सिर्फ पेड़ बनेंगे, बल्कि लोगों के भीतर पर्यावरण के प्रति जिम्मेदारी की नई चेतना भी जगाएंगे।
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