रजनी, सत्यदर्शन लाइव : मैं शांति विश्वकर्मा, माँ बम्लेश्वरी की गोद में बसे डोंगरगढ़ की एक साधारण महिला, लेकिन मेरे सपने कभी साधारण नहीं रहे। अगर मेरे जीवन को एक शब्द में कहा जाए, तो वह होगा- “संघर्ष”। बचपन से ही मैंने कठिनाइयों को करीब से देखा, लेकिन शायद वही कठिनाइयाँ मेरी सबसे बड़ी ताकत बन गईं। आज लोग मुझे “ड्रोन दीदी” के नाम से जानते हैं, लेकिन इस पहचान तक पहुंचने का सफर आसान नहीं था।

मुझे बचपन से ही पढ़ने-लिखने का बहुत शौक था। मेरा सपना था कि मैं एक शिक्षिका बनूं, बच्चों को पढ़ाऊं और समाज में कुछ अच्छा करूं। लेकिन 9वीं कक्षा के बाद ही मेरी शादी हो गई और मेरे सपनों पर जैसे विराम लग गया। फिर भी मैंने अपने अंदर की उस इच्छा को कभी मरने नहीं दिया, वह हमेशा मेरे भीतर जिंदा रही।

मेरे जीवन में मेरे पति श्री कुलदीप विश्वकर्मा का बहुत बड़ा योगदान है। उन्होंने मेरे सपनों को समझा और हर कदम पर मेरा साथ दिया। घर-परिवार की जिम्मेदारियों के बीच मैंने अपनी पढ़ाई जारी रखी और बीएससी (बायोलॉजी) तक की शिक्षा पूरी की। मैं हमेशा मानती हूं कि सीखना कभी बंद नहीं होना चाहिए, इसलिए आज भी मैं हर साल कुछ नया सीखने की कोशिश करती हूं।

एक समय ऐसा भी था जब जिंदगी बहुत कठिन हो गई थी। मुझे जंगल जाकर लकड़ियां बीननी पड़ती थीं। कई बार घर में खाने के लिए भी संघर्ष करना पड़ता था। बच्चों की पढ़ाई की फीस भरना मेरे लिए सबसे बड़ी चिंता बन जाती थी। उन दिनों ने मुझे बहुत कुछ सिखाया सबसे जरूरी यह कि हालात चाहे जैसे हों, हमें हार नहीं माननी चाहिए।

इन्हीं संघर्षों के बीच मैंने सोचा कि अगर अकेले मुश्किल है, तो मिलकर कोशिश करनी चाहिए। मैंने अपनी जैसी कुछ और बहनों के साथ मिलकर “माँ वैभवलक्ष्मी स्वयं सहायता समूह” बनाया। हम 15 महिलाओं ने मिलकर पापड़, बड़ी और मुरकु बनाना शुरू किया। धीरे-धीरे हमारा “शांति अचार” भी बाजार में पसंद किया जाने लगा। इससे हमें आर्थिक मजबूती मिली और आत्मविश्वास भी बढ़ा।

मेरे जीवन का सबसे बड़ा मोड़ जुलाई 2023 में आया, जब मुझे दिल्ली से ड्रोन प्रशिक्षण के लिए कॉल आया। शुरुआत में मुझे विश्वास नहीं हुआ, लेकिन मैंने हिम्मत जुटाई और सभी प्रक्रियाओं को पूरा किया। ग्वालियर में इफको द्वारा 15 दिनों का प्रशिक्षण मिला और वहीं से मेरी जिंदगी ने नई उड़ान भरी। जब मैंने पहली बार ड्रोन उड़ाया, तो लगा जैसे मेरे सपनों को पंख लग गए हों।

आज मैं “ड्रोन दीदी” के रूप में जानी जाती हूं और किसानों के खेतों में ड्रोन से खाद और दवाई का छिड़काव करती हूं। हजारों किसानों को मेरी इस सेवा से लाभ मिल रहा है। मुझे “लखपति दीदी” की उपाधि भी मिली है, लेकिन मेरे लिए सबसे बड़ी खुशी यह है कि मैं अपने अन्नदाताओं के काम आ पा रही हूं।

मैं मानती हूं कि संसाधनों की कमी ही मेरी सबसे बड़ी प्रेरणा रही है। अगर जिंदगी में संघर्ष न होता, तो शायद मैं आज यहां तक नहीं पहुंच पाती। मैंने हमेशा अपने काम को ईमानदारी से किया और खुद को कभी भी कम नहीं समझा। आज मैं हर दिन भगवान का धन्यवाद करती हूं और यही चाहती हूं कि मैं आगे भी किसानों की सेवा करती रहूं और ज्यादा से ज्यादा महिलाओं को आत्मनिर्भर बनने के लिए प्रेरित कर सकूं।

संपादन : कमलेश यादव

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