- Post by Admin on Thursday, Apr 09, 2026
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गोपी साहू : यह कहानी एक ऐसे गुरु और शिष्य की है, जिन्होंने असंभव को संभव कर दिखाया. इस जोड़ी में शिष्या पायल नाग और उनके गुरु कुलदीप कुमार हैं. गुरु ने अपनी शिष्या की प्रतिभा को पहचानकर उसे निखारा और आज पायल नाग देश ही नहीं, बल्कि दुनिया भर में अपनी पहचान बना चुकी हैं. पायल इस समय दुनिया की पहली क्वाड्रपल पैरा तीरंदाज मानी जाती हैं. यानी वह ऐसी खिलाड़ी हैं जिनके न तो दोनों हाथ हैं और न ही दोनों पैर, लेकिन इसके बावजूद उन्होंने कई बड़े पैरा तीरंदाजों को पीछे छोड़ते हुए विश्व स्तर पर शीर्ष स्थान हासिल किया है.
8 साल की उम्र में खो दिए दोनों हाथ और पैर पायल नाग ने बताया कि वह महज 8 साल की थीं, जब एक दर्दनाक हादसे में उन्होंने अपने दोनों हाथ और पैर खो दिए. उन्होंने उस घटना को याद करते हुए बताया कि उनके छोटे भाई ने अनजाने में एक कपड़ा छत से बिजली के तारों पर फेंक दिया था और उसे लाने के लिए उनसे कहा. भाई की बात मानते हुए पायल ने लोहे की रॉड से कपड़ा उतारने की कोशिश की, तभी उन्हें तेज करंट लग गया. इस हादसे ने उनकी जिंदगी पूरी तरह बदल दी, लेकिन उन्होंने हार नहीं मानी.
सोशल मीडिया से मिली पहचान, फिर बदली किस्मत पायल ने बताया कि हादसे के बाद वह अपने मुंह से पेंटिंग बनाया करती थीं. उनकी यह कला सोशल मीडिया पर वायरल हो गई और साल 2022 में उनकी पहचान बनी. इसी दौरान उनकी प्रतिभा पर कोच कुलदीप कुमार की नजर पड़ी. इसके बाद उन्होंने पायल को एक अनाथालय से निकालकर जम्मू स्थित माता वैष्णो देवी आर्चरी अकादमी में लाकर प्रशिक्षण देना शुरू किया. यहीं से पायल की तीरंदाजी की यात्रा शुरू हुई.
गुरु ने तैयार किया खास डिवाइस कोच कुलदीप कुमार ने बताया कि पायल ने केवल 3 से 4 साल पहले ही तीरंदाजी शुरू की, लेकिन इतने कम समय में उन्होंने कई बड़ी उपलब्धियां हासिल कर ली हैं. पायल ने देश के नामी पैरा तीरंदाजों जैसे शीतल देवी और पैरालंपियन ज्योति बालियान को भी पछाड़ते हुए पहला स्थान हासिल किया है. उन्होंने ओलंपिक राउंड में शीतल देवी को हराकर नेशनल चैंपियन का खिताब भी जीता है.
पायल के लिए एक विशेष डिवाइस तैयार कुलदीप कुमार ने यह भी बताया कि जब उन्होंने पहली बार पायल को देखा, तो उनके सामने सबसे बड़ी चुनौती यह थी कि बिना हाथ और पैरों के वह तीरंदाजी कैसे कर पाएंगी. इसी को ध्यान में रखते हुए उन्होंने पायल के लिए एक विशेष डिवाइस तैयार किया, जिसे शरीर पर लगाकर वह निशाना साध सकती हैं. इस डिवाइस को भारतीय और अंतरराष्ट्रीय आर्चरी संस्थाओं से मान्यता भी मिल चुकी है. अब इस तकनीक का उपयोग अन्य पैरा तीरंदाज भी कर सकते हैं और इसे भारत में ही विकसित किया गया है. पायल नाग की यह प्रेरणादायक कहानी इस बात का उदाहरण है कि अगर हौसला मजबूत हो और सही मार्गदर्शन मिले, तो कोई भी बाधा सफलता की राह में रुकावट नहीं बन सकती
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