गोपी साहू, सत्यदर्शन लाइव : शाम ढलते ही भारत के कई घरों में सिर्फ परिवार के लिए ही नहीं, बल्कि जरूरतमंदों के लिए भी भोजन तैयार होता है। दाल, चावल, रोटी और सब्ज़ियों की खुशबू के साथ इन रसोईघरों में करुणा भी पकती है। कई परिवार अपनी थाली से थोड़ा हिस्सा अलग रखकर उन लोगों तक पहुंचाते हैं जिनके पास खाने के लिए कुछ नहीं होता। यह छोटी-सी पहल भूख मिटाने के साथ-साथ मानवता और सम्मान का संदेश भी देती है।

कोलकाता के 70 वर्षीय सैफुल इस्लाम कई वर्षों से जरूरतमंदों को भोजन कराने की इस परंपरा को निभा रहे हैं। उनका मानना है कि जब इंसान खुद भूख का एहसास करता है, तब दूसरों की भूख समझना आसान हो जाता है। बचपन से ही उन्होंने साझा करने की शिक्षा पाई और उसी भावना के साथ वे आज भी जरूरतमंदों के बीच भोजन और मदद पहुंचाने का काम करते हैं। उनके अनुसार, किसी के साथ भोजन साझा करना केवल पेट भरना नहीं बल्कि दिलों को जोड़ने का काम करता है।

इसी तरह कोलकाता के ही व्यवसायी मोहम्मद शब्बीर अहमद भी वर्षों से लोगों की मदद करते आ रहे हैं। उनका कहना है कि वे अकेले खाना नहीं खा सकते, जब तक आसपास किसी जरूरतमंद को भोजन न मिल जाए। कई आपदाओं और कठिन परिस्थितियों में उन्होंने भोजन, दवाइयों और जरूरी सामग्री पहुंचाकर लोगों की मदद की। वे मानते हैं कि सच्ची मदद वही है जो बिना किसी दिखावे और पहचान की उम्मीद के की जाए।

उनकी बेटी सूफिया हसन भी इसी परंपरा को आगे बढ़ा रही हैं। उन्होंने बचपन से अपने माता-पिता को लोगों की सेवा करते देखा और वही सीख उनके जीवन का हिस्सा बन गई। परिवार मिलकर भोजन तैयार करता है और जरूरतमंदों तक पहुंचाता है। उनके लिए यह बचा हुआ खाना बांटना नहीं बल्कि वही भोजन साझा करना है जो वे स्वयं खाते हैं। इससे उन्हें यह संतोष मिलता है कि उनकी छोटी-सी कोशिश किसी की भूख मिटा सकती है।

दिल्ली में गृहिणी पायल कुमार ने भी कोविड-19 लॉकडाउन के दौरान इसी भावना से एक पहल शुरू की। उन्होंने अपने घर की रसोई से जरूरतमंद बच्चों को भोजन कराना शुरू किया, जो धीरे-धीरे एक नियमित अभियान बन गया। उनका मानना है कि खाली पेट शिक्षा और बचपन दोनों अधूरे रह जाते हैं। इसलिए वे रोज़ाना बच्चों के लिए पौष्टिक भोजन तैयार करती हैं और उन्हें सम्मान के साथ परोसती हैं।

इन सभी कहानियों का सार यही है कि करुणा की शुरुआत घर से होती है। एक अतिरिक्त रोटी, एक अतिरिक्त थाली और एक सच्ची भावना कई भूखे पेटों को राहत दे सकती है। जब लोग बिना किसी अपेक्षा के मदद करते हैं, तो वह सिर्फ भोजन नहीं बल्कि उम्मीद और इंसानियत भी बांटते हैं।

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