- Post by Admin on Sunday, Dec 14, 2025
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कमलेश यादव : Social changemakers परिवर्तन का बीजारोपण तभी सच्चा फल देता है जब वह दिल से निकले, छत्तीसगढ़ के रहने वाले वीरेंद्र सिंह का हर कदम लोगों को प्रेरित करता है। तालाबों की गंदगी हटाकर स्वच्छ पानी लौटाना हो या घने जंगलों को बचाने की जिद, उनकी निस्वार्थ भावना और प्रकृति के प्रति गहरा प्रेम उन्हें औरों से अलग करता हैं। गाँव की गलियों से लेकर पंचायत के सभागार तक, उनकी आवाज़ सरल पर असरदार रहती है “हाथ से हाथ मिलाकर काम करो" इसी जज़्बा से आज एक मजबूत कारवां बन गया हैं। वीरेंद्र सिंह ने सिर्फ़ पेड़-पौधे ही नहीं बचाए, बल्कि एक पूरी पीढ़ी को प्रकृति से जोड़ने का रास्ता दिया हैं।
गौरतलब है कि, वीरेंद्र जी का काम सिर्फ़ अभियान चलाना नहीं, बल्कि लोगों के संग चलना है। वे स्थानीय युवाओं को नेतृत्व के छोटे-छोटे काम सौंपकर उन्हें ज़िम्मेदार बनाते हैं। तालाबों की सफाई के साथ उन्होंने जल संचयन और वर्षा जल के संरक्षण की छोटी-छोटी तकनीकों को भी गांव वालों तक पहुँचाया, जिससे सूखा और जल संकट के समय लोगों को राहत मिली।
उनकी पहुँच ऐसी रही कि किसान, शिक्षक, छात्र और बुज़ुर्ग सबने मिलकर छोटे-छोटे समूह बनाकर काम करना शुरू कर दिया। जंगलों के संरक्षण में उनकी रणनीति न केवल पौधारोपण रही, बल्कि अवैध कटाई रोकने, वन्यजीवों के लिए मार्ग बनवाने और जंगलों के बाड़े के इर्द-गिर्द समुदाय-आधारित पहरेदारी स्थापित करने तक गई।
उन्होंने स्थानीय स्कूलों में जागरूकता अभियान शुरू की, जहाँ बच्चे पीढ़ियों के साथ जुड़कर पेड़ लगाने, जंगलों की किस्म-किस्म की पहचान और पारंपरिक औषधीय पौधों की जानकारी सीखते हैं।
इस सबका असर यह हुआ कि लोग अब जंगलों को केवल 'कांटेदार भूमि' नहीं, बल्कि जीवनदायिनी निधि के रूप में देखने लगे। मुश्किलें आईं, विरोध, संसाधनों की कमी और कभी-कभी नीरसता भी पर वीरेंद्र ने कभी हार नहीं मानी। वे कहते हैं कि असली सफलता तब मिलती है जब छोटे-छोटे काम मिलकर बड़े बदलाव की नींव रखते हैं।
इसलिए उन्होंने स्थानीय लोगो के साथ साझेदारी कर कई दीर्घकालिक प्रोजेक्ट शुरू किए: सामुदायिक बाग, जल-प्रबंधन समितियाँ और “हर घर एक पेड़” जैसी पहलें, जिनसे सिर्फ पर्यावरण सुधरा ही नहीं बल्कि लोगों की आमदनी और स्वास्थ्य में भी सुधार हुआ।
उनकी कहानी केवल वीरेंद्र सिंह की नहीं रही यह उन हज़ारों हाथों की कहानी है जिनमें उन्होंने विश्वास रखा और जिनके साथ मिलकर उन्होंने परिवर्तन की मशाल जलाई। आज दल्ली राजहरा की गलियाँ, तालाब और जंगल उनके प्रयासों की गवाही देते हैं; और उनकी प्रेरणा दूर-दूर तक फैल रही है। अगर आप भी प्रकृति के साथ मेल जोड़ना चाहते हैं, तो वीरेंद्र की तरह छोटे कदम उठाइए एक तालाब साफ़ करना, एक पेड़ लगाना, या किसी बच्चे को प्रकृति का पाठ पढ़ाना। बदलाव वही करता है जो बदलने की ठान लेता है और वीरेंद्र ने यह ठान लिया।
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