गोपी साहू :जल, जंगल और जमीन की धरती झारखंड. इस राज्य का नाम भी जंगलों के कारण ही झारखंड पड़ा है. आदिवासियों की बहुतायत संख्या वाला यह राज्य जंगलों की भूमि वाला राज्य इसलिए बन पाया क्योंकि, इसके जंगलों को बचाने का जिम्मा सिर्फ वन विभाग ने नहीं उठा रखा है. बल्कि यहां के लोग भी इसे लेकर बहुत जागरूक हैं. वन संरक्षण की ऐसी ही कहानी बयां करता है खूंटी जिले का बुरुमा जंगल. इस जंगल का खुद का फॉरेस्ट ऑफिसर है. जो पेड़ काटने वालों और तस्करों से जंगलों की रक्षा करता है. और इसमें फॉरेस्ट ऑफिसर की मदद पूरे गांव के लोग करते हैं. यही कारण है कि यहां के जंगल सुरक्षित हैं.

गौरतलब है कि, बुरुमा जंगल खूंटी जिले के मुरहू प्रखंड क्षेत्र में स्थित है. जहां हर साल एक बार ग्रामीणों की बैठक होती है. इस बैठक में चुना जाता है - बिर होरो नी. बिर होरो नी का मतलब है जंगल का रखवाला. यही बिर होरो नी जंगलों की रखवाली करते हैं. एक साल के लिए एक बिर होरो नी को चुना जाता है.

बुरुमा जंगल मुरहू प्रखंड क्षेत्र के चार गांवों के आसपास करीब 400 एकड़ में फैला है. वर्तमान में हेठगोआ पंचायत के लोदोडीह टोली गांव निवासी 62 वर्षीय एंथोनी ओड़ेया बुरुमा जंगल की रक्षा करते हैं. उनके तीन बेटे हैं और तीनों ही बेटे खूंटी में रहकर व्यापार करते हैं. लेकिन उनसे दूर एंथोनी खुद जंगल की रक्षा करते हैं. जंगल की रक्षा के लिए पूरे गांव की पहल पर ग्राम प्रधान ने एंथोनी को रखवाली का जिम्मा दिया है.

फिलहाल एंथोनी इसी साल के जनवरी महीने से जंगल की पहरेदारी कर रहे हैं. 62 वर्षीय एंथोनी ओड़ेया घनघोर बारिश के मौसम में भी जंगलों में घूमते दिख जाएंगे. सुबह होते ही वे अपने घर से पांव में हवाई चप्पल, हाथ में छाता, लोहे की एक रॉड और टोनो लेकर निकल जाते हैं जंगल की ओर. एंथोनी को तनख्वाह सरकार से नहीं मिलती. बल्कि हर मुंडा घर से उन्हें सालाना 10 पयला (कटोरा) चावल और 20 रुपए मिलता है.

उन्हें मुंडा समाज ने इस साल का बिर होरो नी चुना है. एंथोनी ओड़िया खूंटी जिले के मुरहू प्रखंड अंतगर्त मुंडा टोली, इंदलडी, पाहन टोली और लोदोडीह गांव के बिर होरो नी चुने गए हैं, इन चार गांवों के आसपास करीब 400 एकड़ में घने जंगल हैं. जंगल में साल, आम, जामुन, केंदू, कटहल, महुआ के पेड़ों समेत तमाम तरह की झाड़ियां, जंगली कंद मूल मौजूद हैं. इसके साथ ही जंगली जानवर, मोर और विशाल सांपों की भरमार भी है.

बिर होरो नी इन सभी की रक्षा करते हैं. यह आदिवासी समाज की स्वशासन व्यवस्था का सर्वोत्तम उदाहरण है. जंगल के रक्षक एंथोनी ओड़ेया बताते हैं कि दूसरे गांव के लोग जंगल से लकड़ी काट कर ले जाते थे. जिनसे जंगलों की रक्षा के लिए यह परंपरा 100 सालों से भी ज्यादा समय से चली आ रही है. उनका कहना है कि आदिवासी रीति रिवाजों के अनुसार जंगल की रक्षा खुद आदिवासी समुदाय के लोग करते हैं. उनका मानना है कि जंगल हमारा है और इसकी रक्षा भी हम खुद करेंगे.

100 वर्षो से जंगल की रक्षा और रक्षक को रखने की परंपरा गांव में चली आ रही है. बगैर किसी सरकारी फंड और सरकार के भरोसे गांव वाले खुद जल, जंगल और जमीन की रक्षा बिर होरो नी: (जंगल का रखवाला) जैसी परंपरागत पद्धतियों से करते आ रहे हैं. एंथोनी ओड़ेया को इस बार जंगल की रखवाली की जिम्मेदारी दी गई है. ग्राम सभा ने यह प्रावधान बना रखा है कि अगर कोई भी व्यक्ति बिना ग्राम सभा व पंच की अनुमति के जंगल से लकड़ी काटते पकड़ा जाता है तो उसे ग्राम सभा में 5000 रुपये जुर्माना भरना पड़ता है.

जंगल बचाने की मुंडाओं की इस पारंपरिक पद्धति के कारण आज भी बुरुमा गांव के जंगल सुरक्षित हैं. वहीं एंथोनी ओड़ेया के भतीजे शनिका ओड़ेया बताते हैं कि एंथोनी ओड़ेया को इस बार यह जिम्मेदारी दी गई है. जिसमें हम और पूरे गांव वाले उनकी मदद करते हैं. तस्करों और लकड़ी काटने वालों से जंगल को बचाने के लिए हर साल एक बिर होरो नी की नियुक्ति की जाती है. इसके बदले में उन्हें हर घर से सालाना चावल और 20 रुपये दिए जाते हैं. वहीं मुखिया जगमोहन सिंह मुंडा ने कहा कि तस्करों से जंगल बचाने की यह अनूठी पहल है. सभी जगहों पर जंगल बचाने की पहल होनी चाहिए ताकि लकड़ी चोरों और तस्करों से जंगल बचाए जा सके. मुखिया ने कहा कि उनकी पंचायत के बुरुमा जंगल की सुरक्षा बहुत पुरानी है लेकिन समय के अनुसार इसमें बदलाव किए गए हैं. वे बिना सरकारी मदद और बिना वन विभाग के सहयोग के जंगल की रक्षा करते आ रहे हैं.

पारंपरिक व्यवस्था के तहत जंगल की रखवाली करने वाले एंथोनी को साल में एक बार गांव के 110 परिवारों से 10-10 कट्टा धान और 20 रुपये नकद भी मिलेंगे. बिर होरो नी जैसी आदिवासियों की परंपराओं के कारण ही झारखंड वनों से संपन्न राज्य बना हुआ है.

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