- Post by Admin on Friday, Jun 13, 2025
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कारवी : जब आसमान से ज़मीन की ओर एक जलते अंगारे की तरह गिरा बोइंग 787, तो किसे पता था कि मौत की गोद में समाए 242 लोगों के बीच एक नाम ऐसा होगा, जो नियति की चुनौतियों को मात देकर ज़िंदगी का दूसरा जन्म पाएगा। जब लपटों में हर दिशा खो चुकी थी, चारों ओर हाहाकार था, तब भी ईश्वर ने शायद सीट 11A को बचा लेने की ठान रखी थी। यह हादसा नहीं, एक चेतावनी थी कि जीवन क्षणिक है, जो करना है अभी कर लो, क्योंकि अगला पल किसी का नहीं होता।
गौरतलब है कि, रमेश विश्वास कुमार, जो एयर इंडिया की फ्लाइट AI-171 में लंदन की यात्रा पर निकले थे, अब अस्पताल के बिस्तर पर हैं जिंदा, लेकिन गहरे सदमे में। उन्होंने मीडिया से कहा—"वो धमाका… आग की दीवार… मैं बस ईश्वर का नाम ले रहा था… मुझे यकीन नहीं होता कि मैं जिंदा हूं।" उनके ये शब्द बता रहे हैं कि जब सबकुछ खत्म हो जाता है, तब भी ऊपर वाला अगर चाहे तो चमत्कार हो सकता है।
ये हादसा सिर्फ एक खबर नहीं, एक सबक है। आज हम अपनी योजनाएं कल पर टालते हैं, रिश्तों को नजरअंदाज करते हैं, जीवन को स्थायी मान बैठते हैं—जबकि हर सांस, हर यात्रा, हर टेकऑफ संभावनाओं की अंधी सुरंग है।
विमान हादसों से बचाव: अब भी अधूरी तैयारी एक बड़ा सवाल ये भी है कि आधुनिक टेक्नोलॉजी और सुरक्षा मानकों के दौर में भी विमान दुर्घटनाओं से बचाव की ठोस योजना क्यों नहीं है? विमान के अंदर मौजूद सुरक्षा निर्देश महज औपचारिकता बन चुके हैं। यात्रियों को अब भी नहीं बताया जाता कि किस परिस्थिति में किस सीट पर बैठना अधिक सुरक्षित होता है। भारत जैसे देश में ‘क्रैश सर्वाइवल ट्रेनिंग’ अभी तक जनता के लिए सुलभ क्यों नहीं है? क्या विमानों में आग-रोधी सीटें, बेहतर इमरजेंसी स्लाइड्स, या ऑटोमेटिक पैराशूट सिस्टम जैसी चीजें अब भी सपना हैं?
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