- Post by Admin on Friday, Jun 19, 2026
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राजनांदगांव : छत्तीसगढ़ के डोंगरगढ़ में एक ऐसा परिवार है, जिसने नक्सलवाद की पीड़ा को बहुत करीब से महसूस किया है। कभी भय, असुरक्षा और अपनों को खोने के दर्द से घिरा यह परिवार आज शिक्षा के सहारे नई दिशा में आगे बढ़ रहा है। यह कहानी केवल एक परिवार की नहीं, बल्कि उन तमाम लोगों की प्रेरणा है जो कठिन परिस्थितियों के बावजूद हार नहीं मानते।
धीरेंद्र बबला साहू के जीवन में वह दौर भी आया जब माओवादी हिंसा ने उनके परिवार को गहरा घाव दिया। उनके पिता स्वर्गीय बबला साहू की असमय मृत्यु ने पूरे परिवार को झकझोर कर रख दिया। एक ऐसा दर्द, जिसकी भरपाई कभी संभव नहीं हो सकती। परिवार लंबे समय तक उस सदमे से उबरने की कोशिश करता रहा और भविष्य अनिश्चित दिखाई देने लगा था।
लेकिन धीरेंद्र साहू ने परिस्थितियों के सामने घुटने टेकने के बजाय संघर्ष का रास्ता चुना। उन्होंने महसूस किया कि हिंसा केवल विनाश का मार्ग दिखाती है, जबकि शिक्षा जीवन को नई दिशा और नई पहचान देती है। इसी सोच के साथ उन्होंने अपने अधूरे सपनों को अपनी बेटियों की आंखों में संजोना शुरू किया।
आज उनकी दोनों नन्ही बेटियां अच्छे विद्यालय में पढ़ाई कर रही हैं। स्कूल की ओर बढ़ते उनके छोटे-छोटे कदम केवल शिक्षा की ओर नहीं, बल्कि एक बेहतर भविष्य की ओर बढ़ रहे हैं। पिता का सपना है कि उनकी बेटियां आत्मनिर्भर बनें, समाज में अपनी पहचान स्थापित करें और उन ऊंचाइयों को छुएं जिनकी कल्पना कभी उन्होंने स्वयं की थी।
धीरेंद्र का मानना है कि बच्चों को अच्छी शिक्षा देना ही सबसे बड़ा पूंजी है। उन्होंने कठिन परिस्थितियों और आर्थिक चुनौतियों के बावजूद बेटियों की पढ़ाई को कभी प्रभावित नहीं होने दिया। यही कारण है कि आज उनके घर में निराशा की जगह उम्मीद, और दुख की जगह मुस्कान ने ले ली है।
यह कहानी साबित करती है कि हालात कितने भी कठिन क्यों न हों, यदि संकल्प मजबूत हो तो अंधकार को ज्ञान के प्रकाश से दूर किया जा सकता है। नक्सलवाद के दंश से जूझ चुके इस परिवार ने शिक्षा को अपना हथियार बनाया और आज उनकी बेटियां उस नई सुबह की प्रतीक बन रही हैं, जहां हिंसा नहीं बल्कि ज्ञान, सपने और संभावनाएं भविष्य का निर्माण करती हैं।
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